मुंबईः मुंबई के सांस्कृतिक कैलेंडर में काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार बन चुका है। यह विचार है-कला, संस्कृति और लोकतांत्रिक भागीदारी का। फिल्मी सितारों की चकाचौंध से दूर, यह फेस्टिवल इस विश्वास पर खड़ा है कि किसी भी शहर की असली पहचान उसकी रचनात्मक ऊर्जा और आम लोगों की सहभागिता से बनती है।
1999 में काला घोड़ा एसोसिएशन द्वारा शुरू किया गया यह आयोजन मुंबई का पहला मल्टी-डिसिप्लिनरी स्ट्रीट आर्ट फेस्टिवल था। बीते दो दशकों में यह भारत के सबसे बड़े मुफ्त स्ट्रीट फेस्टिवल्स में शुमार हो गया है। हर साल जनवरी या फरवरी में आयोजित होने वाला यह उत्सव न सिर्फ मुंबई बल्कि देश-विदेश से आए हजारों कला प्रेमियों को आकर्षित करता है।
फेस्टिवल की डायरेक्टर ब्रिंदा मिलर के अनुसार, काला घोड़ा की ताकत उसकी आत्मा में है, न कि स्टार पावर में। उनका कहना है कि यह फेस्टिवल फिल्मी सितारों पर निर्भर नहीं करता। अगर वे आते हैं तो स्वागत है, लेकिन आयोजन का केंद्र बिंदु हमेशा कला, कलाकार और दर्शक ही रहते हैं। यही वजह है कि यहां युवाओं को भी वही मंच मिलता है।
26वें संस्करण के साथ यह फेस्टिवल और भी भव्य हो गया है। इस बार करीब 350 कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें विज़ुअल आर्ट्स, थिएटर, साहित्य, संगीत और पब्लिक इंस्टॉलेशंस शामिल हैं। इस साल की खास झलकियों में अभिनेता और कॉमेडियन वीर दास की किताब “The Outsider: A Memoir for Misfits” का लॉन्च शामिल है। इसके अलावा फरहान अख्तर, उषा उत्थुप, राहुल देशपांडे और ग्रैमी अवॉर्ड विजेता संगीतकार रिकी केज जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियां भी दर्शकों को देखने को मिलेंगी।
फेस्टिवल में गुलजार, विशाल भारद्वाज, शाहिद कपूर, भूमि पेडनेकर, सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर और अनुपम खेर जैसी हस्तियों की मौजूदगी भी संभावित है। लेकिन इसके बावजूद आयोजन का स्वरूप पूरी तरह समावेशी बना रहता है-जहां आम दर्शक और नामचीन कलाकार एक ही जगह, एक ही मंच पर संस्कृति का उत्सव मनाते हैं।
काला घोड़ा फेस्टिवल की एक और बड़ी खासियत है इसका सामाजिक सरोकार। यह पूरी तरह मुफ्त आयोजन है। इसके बावजूद कई नामी कलाकार कम या बिना पारिश्रमिक के यहां प्रस्तुति देते हैं, क्योंकि वे इस बात को समझते हैं कि यह आयोजन व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं बल्कि शहर की सांस्कृतिक समृद्धि के लिए है ।
फेस्टिवल से होने वाली आय का इस्तेमाल दक्षिण मुंबई की ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण में किया जाता है। डेविड ससून लाइब्रेरी, यहूदी सिनेगॉग, वाडिया क्लॉक टावर और एल्फिंस्टन कॉलेज जैसी विरासत इमारतों के संरक्षण में यह फेस्टिवल लगातार योगदान दे रहा है। इस साल दिव्यांगजनों से जुड़े कार्यक्रमों पर भी विशेष फोकस किया गया है जो इसकी सोच को और व्यापक बनाता है।
ब्रिंदा मिलर खुद मानती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह आयोजन इतना बड़ा रूप ले लेगा। शुरुआती वर्षों में फंडिंग एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन टाटा और जिंदल परिवार जैसे संस्थानों के सहयोग ने इस फेस्टिवल को न सिर्फ टिकाऊ बनाया, बल्कि लगातार विस्तार भी दिया।
काला घोड़ा आर्ट्स फेस्टिवल आज इस बात का उदाहरण है कि जब कला को केंद्र में रखा जाए, जब आयोजन जनता के लिए और जनता के साथ हो, तब किसी भी शहर की सांस्कृतिक पहचान वैश्विक स्तर पर चमक सकती है। यह फेस्टिवल बताता है कि असली स्टारडम कला का होता है और वही काला घोड़ा की सबसे बड़ी ताकत है।