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डिजिटल दुनिया ने ली खिलौनों की जगह, हाथों से फिसल रहा बचपन! वजह कहीं मोबाइल तो नहीं?

बच्चों में मोबाइल फोन की लत को लेकर कोलकाता के प्रमुख स्कूलों के प्रिंसिपलों की क्या है राय और कैसे किया जा सकता है इसे नियंत्रित?

By Moumita Bhattacharya

Feb 06, 2026 18:45 IST

स्कूल का होमवर्क क्यों नहीं हुआ? परीक्षा में मार्क्स क्यों कम आए? आंखों पर मोटा चश्मा क्यों चढ़ा हुआ है? छोटा सा बच्चा अक्सर सिरदर्द से परेशान क्यों रहता है? बच्चा चिड़चिड़ा क्यों होने लगा है, माता-पिता या परिवार के दूसरे सदस्यों से कटा-कटा सा क्यों रहता है? इस तरह के अधिकांश सवालों का बस एक ही जवाब है - मोबाइल फोन की लत। किसी को मोबाइल में गेम्स खेलने की लत लग चुकी है तो कोई कम उम्र से ही अपना ज्यादातर वक्त सोशल मीडिया पर बिताने लगा है।

हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की एक घोषणा ने बच्चों में बढ़ते मोबाइल फोन के प्रति आसक्ति को एक बार फिर से चर्चाओं में ला दिया है। वहीं पिछले दिनों गाजियाबाद में 3 बहनों का एक साथ बहुमंजिला इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या करने का एक मामला भी सामने आ चुका है। इसमें पुलिस का कहना है कि पिता द्वारा मोबाइल फोन छीन लेने और कोरियन ड्रामा देखने से रोकने को लेकर हुए विवाद में बच्चियां गहरे सदमें में चली गयी थी।

ऐसी स्थिति में कोलकाता के प्रमुख स्कूलों के प्रिंसिपल क्या सोचते हैं? बच्चों को मोबाइल फोन की लत से दूर करने के लिए स्कूलों की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं? मोबाइल फोन को लेकर स्कूलों में कौन से नियम लागू हैं? इन सभी सवालों का जवाब ढूंढने की समाचार एई समय ने कोशिश की।

आइए जान लेते हैं इस बारे में विस्तार से -

क्या है हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री की घोषणा?

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में घोषणा की है कि राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्रों के लिए 1 मार्च 2026 से मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने पर पाबंदी रहेगी। अगर कोई छात्र इसका उल्लंघन करता हुआ पाया जाता है तो उसके खिलाफ ₹500 का जुर्माना लगाया जाएगा।

सिर्फ इतना ही नहीं डिवाइस (मोबाइल) को जब्त भी कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा जा रहा है कि स्कूलों में लंच ब्रेक के दौरान बच्चे मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं जिसकी वजह से पढ़ाई से उनका ध्यान भटक जाता है और उसका मानसिक विकास भी प्रभावित होता है।

कोलकाता के प्रमुख स्कूलों ने क्या कहा?

हमने कोलकाता के कई प्रमुख निजी स्कूलों के प्रिंसिपलों से बात की और उनसे इस मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी। हर प्रिंसिपल ने बच्चों द्वारा मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर कई जरूरी बातें तो बतायी लेकिन सभी ने यह जरूर बताया कि सीनियर से लेकर जूनियर कक्षाओं तक में मोबाइल फोन लेकर जाना स्कूलों में पूरी तरह से बैन है।

दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) रुबी पार्क

प्रिंसिपल जयति चौधरी ने बताया कि हमारे स्कूल में बच्चों को मोबाइल लाने की अनुमति नहीं होती है। बच्चे यहां पढ़ाई और अन्य कई तरह की गतिविधियों में हिस्सा लेने आते हैं। स्कूल में उन्हें उनकी जरूरत की सभी सुविधाएं मुहैया करवायी जाती हैं। इसलिए उन्हें स्कूल में मोबाइल लेकर आने की न तो अनुमति दी जाती है और न ही इसकी कोई जरूरत होती है।

हरियाणा विद्या मंदिर

प्रिंसिपल संघमित्रा बनर्जी ने भी कहा कि स्कूल में मोबाइल लेकर आने की अनुमति नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा, "हम सिर्फ बच्चों को मोबाइल लाने से मना ही नहीं करते हैं बल्कि बीच-बीच में सरप्राइज चेकिंग भी की जाती है। अगर कोई बच्चा मोबाइल फोन के साथ पकड़ा जाता है तो उसका मोबाइल 15 दिनों के लिए जब्त कर लिया जाता है। इसके बाद जुर्माना देकर ही बच्चे मोबाइल वापस ले सकेंगे।" बनर्जी कहती हैं कि हर कक्षा में जब भी पेरेंट्स-टीचर मीटिंग बुलायी जाती है हम हर बार प्रत्येक अभिभावक को यहीं सलाह देते हैं कि बच्चों को मोबाइल से जितना दूर रखा जा सकें, उतना ही अच्छा है।

बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की इतनी जरूरत क्यों है? इस सवाल का जवाब देते हुए संघमित्रा बनर्जी ने कहा कि बच्चों को यह पता ही नहीं होता है कि मोबाइल का कितना इस्तेमाल करना सही होता है और कहां रुक जाना चाहिए! हम बच्चों को मोबाइल की आदत से दूर रखने के लिए एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी पर जोर देते हैं। इसके अलावा हमारे स्कूल में काउंसिलिंग सेशन का आयोजन किया जाता है जिसमें मोबाइल की लत से दूर रहने, साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के इस्तेमाल आदि से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी दी जाती है।

क्या आज के तकनीकी युग में बच्चों को मोबाइल से दूर रखना संभव हो पाएगा? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हम बच्चों से मोबाइल का इस्तेमाल बिल्कुल न करने की बात नहीं कहते हैं। हम उनसे यह कहते हैं कि जब वे सेल्फ स्टडी कर रहे हो, तब अपना फोन स्वीच्ड ऑफ करके दूर रख दें। जब खाली समय रहे सिर्फ उसी समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल करें। हमें आज भी लगता है कि किताबों की जगह मोबाइल कभी ले सकता है। किताबों से मिलने वाली जानकारी हमेशा ऊपर रहेगी। हां, इंटरनेट से थोड़ा रेफरेंस आदि लिया जा सकता है।

नेशनल इंग्लिश स्कूल

प्रिंसिपल मौसमी साहा से भी जब यह सवाल किया गया तो उन्होंने भी कहा कि व्यक्तिगत तौर पर मैं 15 साल तक के बच्चों के लिए अगर मोबाइल फोन पर पाबंदी लगाने का समर्थन करती हूं। मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल करने की वजह से डिमेंशिया, पार्किंसन, एल्जाइमर जैसी कई बीमारियां पहले के मुकाबले बढ़ने लगी हैं। बच्चों में आज-कल तनाव, मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां काफी ज्यादा दिखने लगी हैं। पहले तो ऐसी समस्याएं कम ही हुआ करती थी क्योंकि बच्चे मैदान इत्यादि में खेलने जाते थे, दूसरे बच्चों से घुलते-मिलते थे।

साहा आगे कहती हैं, "अधिकांश स्कूलों में मोबाइल के इस्तेमाल पर पाबंदी रहती है लेकिन बच्चे घर पर मोबाइल का जमकर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना होगा कि बच्चे मोबाइल में क्या देख रहे हैं। अगर पढ़ाई के लिए जरूरी भी है तो उन्हें मोबाइल के बजाए लैपटॉप या डेस्कटॉप दे क्योंकि उसका स्क्रीन बड़ा होता है। बड़ा स्क्रीन होने से अभिभावकों के लिए भी यह ध्यान रखना आसान हो जाता है कि बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं।"

मौसमी साहा कहती हैं कि अभिभावक ही बच्चों के रोल-मॉडल होते हैं। माता-पिता अगर खुद मोबाइल में खोए रहे और बच्चों से मोबाइल का इस्तेमाल न करने को कहें तो बच्चे भला उनकी बात कैसे मानेंगे! परिवार को साथ मिलकर समय बिताना होगा। साथ में डिनर या ब्रेकफास्ट करने का घर में नियम बनाएं जहां मोबाइल का कोई इस्तेमाल नहीं करेगा।

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