धर्मेन्द्र प्रधान
परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम को भारत की शिक्षा यात्रा में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री और विद्यार्थियों के बीच एक साधारण वार्षिक संवाद के रूप में शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे छात्रों के समग्र कल्याण पर केंद्रित एक देशव्यापी जनआंदोलन बन गई। आज यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रह गया है बल्कि शिक्षक, अभिभावक, स्कूल और समाज के विभिन्न वर्गों की साझा राष्ट्रीय कोशिश का रूप ले चुका है। 4.5 करोड़ से अधिक पंजीकरण, जो पिछले गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड से भी अधिक है, इस पहल की व्यापक स्वीकार्यता और प्रासंगिकता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। अब परीक्षा पे चर्चा सिर्फ एक आयोजन नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए तनावमुक्त, सहयोगी और मानवीय शिक्षा व्यवस्था बनाने की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुकी है।
लेख के केंद्र में प्रधानमंत्री का संवेदनशील और प्रेरणादायी नेतृत्व उभरकर सामने आता है। विद्यार्थियों के साथ उनका संवाद गर्मजोशी से भरा, व्यावहारिक और गहराई से मानवीय बताया गया है। वे औपचारिक सत्ता की सीमाओं से आगे बढ़कर एक मार्गदर्शक और शुभचिंतक की भूमिका निभाते हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभवों, कहानियों और सरल भाषा के माध्यम से वे परीक्षा का डर, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक दबाव जैसे मुद्दों पर बात करते हैं। सादगी, अनुशासन, सकारात्मक सोच और मानव क्षमता में विश्वास पर जोर देते हुए वे छात्रों को यह सिखाते हैं कि परीक्षा डर की नहीं बल्कि सीखने का अवसर है। इससे विद्यार्थियों में धैर्य, एकाग्रता और मानसिक संतुलन विकसित होता है।
लेख यह भी रेखांकित करता है कि हर बच्चा अलग होता है और उसकी सीखने की प्रक्रिया भी अलग होती है। केवल अंक या रैंक के आधार पर प्रतिभा को नहीं आंका जा सकता। वास्तविक उत्कृष्टता समग्र विकास में निहित होती है, जहां गणित, कला, संवेदना और नेतृत्व जैसी विविध क्षमताओं को समान महत्व मिलता है। यही बहुआयामी दृष्टिकोण एक रचनात्मक, नवोन्मेषी और समावेशी समाज की नींव रखता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी सोच के अनुरूप है। इसमें रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच, शारीरिक स्वास्थ्य और खेल आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया है। मातृभाषा में शिक्षा के माध्यम से गहरी समझ विकसित करने और भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक शिक्षा से जोड़ने की बात कही गई है। दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा वर्ष में दो बार कराने का निर्णय छात्रों पर दबाव कम करेगा और सुधार के अधिक अवसर देगा। इसके साथ ही 360 डिग्री समग्र प्रगति कार्ड और सीबीएसई स्कूलों में अनिवार्य सामाजिक-भावनात्मक काउंसलिंग की शुरुआत की गई है।
लेख आधुनिक समय की चुनौतियों जैसे अत्यधिक स्क्रीन टाइम, डिजिटल निर्भरता और ऑनलाइन दबाव को लेकर भी आगाह करता है। ये समस्याएं चिंता बढ़ाती हैं, एकाग्रता घटाती हैं और नींद से जुड़ी परेशानियां पैदा करती हैं इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों से शारीरिक गतिविधियों, रचनात्मक कार्यों और पारिवारिक संवाद को बढ़ावा देने का आग्रह किया गया है। योग, प्राणायाम और ध्यान को मानसिक स्थिरता और जीवन कौशल विकसित करने के महत्वपूर्ण साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
अंत में लेख आज के विद्यार्थियों को विकसित भारत 2047 का निर्माता मानता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में जिज्ञासा, समस्या समाधान और नवाचार को बढ़ावा देना आवश्यक बताया गया है। बच्चों को प्रयोग करने, गलतियां करने और उनसे सीखने की स्वतंत्रता देने की जरूरत पर बल दिया गया है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मस्तिष्क, हृदय और शरीर तीनों का समान रूप से विकास करे। इसी दृष्टि से परीक्षा पे चर्चा युवाओं के मन से डर हटाकर आत्मविश्वासी, सक्षम और मानवीय नागरिक तैयार करने का एक व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य बनकर उभरा है।