नयी दिल्लीः केंद्र सरकार द्वारा विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियम अधिसूचित किए जाने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। इन नियमों को लेकर जहाँ एक ओर सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक ज़रूरी कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे भेदभावपूर्ण और विभाजनकारी मान रहे हैं।
इस विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नए यूजीसी नियमों का बचाव करते हुए कहा है कि इनका कोई दुरुपयोग नहीं किया जाएगा और न ही इनके क्रियान्वयन में किसी प्रकार का भेदभाव होगा।
नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं सभी को आश्वस्त करता हूँ कि कोई भेदभाव नहीं होगा और कोई भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं कर सकता।”
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब 13 जनवरी को अधिसूचित नए यूजीसी नियमों को लेकर देशभर में आलोचना तेज़ हो गई है। ये नए नियम इसी विषय पर बने 2012 के पुराने नियमों का अद्यतन संस्करण हैं।
सरकार का कहना है कि इन नियमों का मुख्य उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले जाति-आधारित भेदभाव पर प्रभावी रोक लगाना है। इसके तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को विशेष समितियाँ और हेल्पलाइन स्थापित करनी होंगी, ताकि इन वर्गों के छात्रों की शिकायतों का समयबद्ध समाधान किया जा सके।
लोगों की आपत्तियाँ क्या हैं?
हालाँकि, इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने गंभीर आपत्तियाँ जताई हैं। उनका तर्क है कि यह ढांचा एकतरफा है और इससे सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि नियमों में संतुलन की कमी है और यह शिक्षा संस्थानों में जाति के आधार पर विभाजन को और गहरा कर सकता है। इस असंतोष का असर ज़मीन पर भी दिखने लगा है। लखनऊ में छात्रों ने लखनऊ विश्वविद्यालय के सामने प्रदर्शन किया और यूजीसी नीतियों के खिलाफ नारेबाज़ी की।
राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ
विवाद केवल छात्र आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा। रायबरेली जिले के सलोन विधानसभा क्षेत्र से भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ने नए यूजीसी नियमों के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में अपने फैसले की जानकारी दी।
अपने पत्र में उन्होंने कहा कि यह कानून “ऊँची जाति के बच्चों के खिलाफ आरक्षण जैसा काला कानून” है, जो समाज के लिए खतरनाक और विभाजनकारी साबित हो सकता है। उन्होंने यह भी लिखा कि ऐसे विधेयक का समर्थन करना उनके आत्मसम्मान और विचारधारा के खिलाफ है।
इसी क्रम में बरेली के निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश में “संवैधानिक विफलता” का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। बरेली में चल रहे अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने दावा किया कि उन्हें ब्राह्मण संगठनों का बढ़ता समर्थन मिल रहा है और कई राज्यों से लोग उनके संपर्क में हैं। अग्निहोत्री ने मीडिया से कहा कि छह राज्यों के विभिन्न संगठन और ब्राह्मण समुदाय के लोग उनसे जुड़े हैं और कई निर्वाचित प्रतिनिधियों ने भी चिंता जताई है कि 13 जनवरी, 2026 को भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित यूजीसी नियम देश के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हो सकते हैं।