डेबरा, पश्चिम मेदिनीपुरः पश्चिम मेदिनीपुर जिले के डेबरा ब्लॉक में स्थित धामतोर बिश्वेश्वर प्राइमरी स्कूल आज ग्रामीण शिक्षा का एक अनोखा मॉडल बनकर उभरा है। यहां पढ़ाई चारदीवारी के भीतर नहीं होती बल्कि हरियाली के बीच बच्चे पढ़ाई करते हैं। स्कूल परिसर में करीब 1000 गमले हैं जिनमें रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। जिधर देखो उधर हरियाली देख मन खुश हो जाता है।
यह माहौल, यह वातावरण स्कूल के टीचर-इन-चार्ज मिस्बाउल हक के प्रयास से संभव हुआ है। वह खुद को ‘नेचर लवर’ नहीं बल्कि ‘फूलों का साथी’ कहलाना पसंद करते हैं। वर्ष 2006 में शिक्षक बनने के बाद उन्होंने तय किया कि स्कूल परिसर को अलग रूप देने के लिए आस पास बगीचे लगाये जाये। वक्त के साथ-साथ उनका सपना पूरा हो गया है।
खाली जमीन बना खूबसूरत बगीचा
1939 में स्थापित इस स्कूल की कुल 54 डेसिमल जमीन में से केवल 10-12 डेसिमल में क्लासरूम हैं। शेष खाली हिस्से को मिस्बाउल हक ने बगीचे में तब्दील कर दिया। यहां खूबसूरत पत्ते वाले अनगिनत पौधे लगाये गये हैं। इसके साथ ही पिटुनिया, डालिया, चंद्रमल्लिका से लेकर कांकड़ा, फर्न और पाइन तक की विविध प्रजातियां हैं। स्कूल में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है जैसे किसी पार्क या नर्सरी में आ गए हों।
हर छात्र के नाम पर एक बगीचा
स्कूल के 85 छात्रों के नाम पर अलग-अलग बगीचे बनाए गए हैं। रवींद्रनाथ टैगोर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और काजी नजरुल इस्लाम जैसे महान व्यक्तित्वों के नाम पर भी विशेष उद्यान तैयार किए गए हैं। छात्र स्वयं अपने बगीचों की देखभाल करते हैं। यदि कोई फूल तोड़ने की कोशिश करता है तो बच्चे उसे रोकते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति लगाव विकसित हुआ है।
सब्जियों से बनता है मिड-डे मील
स्कूल परिसर में बैंगन, मिर्च, लौकी, कुंदरी, पालक और कोसला जैसी सब्जियों की खेती भी की जाती है। इनका उपयोग मिड-डे मील में किया जाता है। हालांकि, मिड-डे मील पकाने के लिए अलग शेड नहीं है और छोटे से बरामदे में बच्चों को एक साथ भोजन करना पड़ता है।
मिस्बाउल हक का समर्पण इस बात से झलकता है कि पिछले वर्ष वे 365 में से 361 दिन मतलब पूरे साल हर दिन स्कूल आते रहे। छुट्टियों में भी वे पौधों की देखभाल के लिए स्कूल आते हैं। उनका यह प्रेम छात्रों को भी प्रेरित करता है। बच्चे भी नहीं चाहते कि स्कूल बंद हो। वे भी अपने बगीचों और पौधों की देखभाल करने के लिए छुट्टी के दिन भी स्कूल चले आते हैं।
क्लासरूम के अंदर भी हरियाली और अनुशासन
सिर्फ बाहर ही नहीं, बल्कि कक्षाओं के भीतर भी मनी प्लांट, एरिका पाम, जेडजेड प्लांट और कैक्टस की उन्नत प्रजातियां रखी गई हैं ताकि हवा शुद्ध रहे। स्कूल में 11 डस्टबिन लगाए गए हैं और बच्चे स्वच्छता का विशेष ध्यान रखते हैं। पढ़ाई शुरू करने से पहले स्कूल के विद्यार्थी मां सरस्वती की मूर्ति के सामने प्रार्थना करते हैं।
सराहना और चुनौतियां
अभिभावकों का मानना है कि छात्रों का स्कूल के प्रति आकर्षण मिस्बाउल सर की मेहनत का परिणाम है। प्रशासन ने भी इस पहल की सराहना की है। इसके साथ ही अतिरिक्त क्लासरूम बनाने के लिए पैसे का इंतजाम करने का भरोसा भी दिया गया है। हालांकि क्लासरूम की कमी और मिड-डे मील शेड का अभाव अभी भी प्रमुख चुनौतियां हैं।
डेबरा का यह प्राथमिक विद्यालय साबित करता है कि यदि शिक्षक में समर्पण और दृष्टि हो, तो सीमित संसाधनों में भी शिक्षा को प्रकृति से जोड़कर एक आदर्श मॉडल तैयार किया जा सकता है। यहां सचमुच हरियाली के बीच फूल ही नहीं खिल रहे हैं, बच्चे भी उत्साह के साथ पढ़ाई कर रहे हैं।