महाशिवरात्रि का पावन पर्व का दिन है। चारों ओर मंदिरों में घंटियाँ बजती रही हैं और “हर हर महादेव” की गूंज सुनाई देती रही है। इसी पावन अवसर पर एक प्राचीन कथा सुनाई जाती है, जो भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है।
कहा जाता है कि हिमालय की ऊँची पहाड़ियों में स्थित अमरनाथ गुफा में आज भी भगवान शिव का वास है। वहाँ बर्फ से बनने वाला शिवलिंग दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि उस गुफा में आज भी एक कबूतरों का जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें शिव-पार्वती की अमर कथा का साक्षी माना जाता है।
एक बार माता पार्वती ने शिवजी से पूछा कि स्वामी आप तो अजर-अमर हैं फिर आपकी गर्दन में नरमुंडों की माला क्यों है? शिवजी पहले तो मुस्कुराकर बात टाल गए, पर पार्वती जी ने जिद पकड़ ली। तब शिवजी ने निश्चय किया कि वे अमरत्व का रहस्य बताएंगे लेकिन किसी एकांत स्थान पर।
रहस्य बताने के लिए वे एक शांत जगह की खोज में निकल पड़े। सबसे पहले उन्होंने अपने प्रिय वाहन नंदी को एक स्थान पर छोड़ दिया जो आगे चलकर पहलगाम कहलाया। फिर उन्होंने अपने मस्तक से चंद्रमा को अलग किया वह स्थान चंदनवाड़ी नाम से प्रसिद्ध हुआ। आगे बढ़ते हुए उन्होंने गंगा जी को पंचतरणी में और सर्पों को शेषनाग झील के पास छोड़ दिया। एक स्थान पर उन्होंने गणेश जी को भी विराम दिया जिसे आज गणेश टॉप कहा जाता है।
सब कुछ त्याग कर अंत में शिवजी अमरनाथ गुफा में पहुँचे। वहाँ उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्वलित कर दी ताकि कोई तीसरा उस रहस्य को न सुन सके। फिर वे अमरत्व की गूढ़ कथा सुनाने लगे।
कहते हैं कि कथा सुनते-सुनते पार्वती जी को नींद आ गई। पर गुफा में मौजूद एक कबूतरों का जोड़ा ध्यान से सब सुन रहा था। जब शिवजी ने देखा कि पार्वती सो चुकी हैं तो वे क्रोधित हुए। तभी वे कबूतर उनके सामने आकर बोले कि प्रभु हमने आपकी कथा छिप कर सुनी है। हमें माफ कर दें यदि आप हमें मार देंगे तो यह अमर कथा अधूरी रह जाएगी।
उनकी बात सुनकर शिवजी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे सदैव वहाँ शिव-पार्वती के प्रतीक रूप में निवास करेंगे।तभी से माना जाता है कि अमरनाथ गुफा के वे कबूतर आज भी उस अमर कथा के जीवित साक्षी हैं।