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साल में 24 एकादशी, हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि का विशेष महत्व

निर्जला और फलाहार व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और नियम, दशमी से शुरू होकर द्वादशी पर होता है व्रत का पारण।

By रजनीश प्रसाद

Feb 12, 2026 19:17 IST

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायी और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। ‘एकादशी’ का शाब्दिक अर्थ है ‘ग्यारह’ और यह तिथि प्रत्येक चंद्र पक्ष के ग्यारहवें दिन आती है। इस प्रकार हर माह दो एकादशी एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है। पूरे वर्ष में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं जिनमें कुछ का विशेष महत्व है, जैसे वैकुंठ एकादशी और आषाढ़ी एकादशी।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से ही हो जाती है। दशमी के दिन सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है और रात्रि से संयम का पालन किया जाता है। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा में गंगाजल, तुलसी पत्र, पुष्प, धूप-दीप और पंचामृत का विशेष महत्व होता है। भक्त दिनभर हरि नाम का स्मरण, भजन-कीर्तन और एकादशी कथा का श्रवण करते हैं।

इस व्रत को ‘हरि वासर’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन उपवास रखने से मन और शरीर की शुद्धि होती है तथा पापों का क्षय होता है। व्रत के दौरान अन्न, विशेषकर चावल, दाल और तामसिक भोजन का त्याग किया जाता है। फल, दूध, सूखे मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन ग्रहण किए जा सकते हैं। कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत भी रखते हैं, जिसमें जल तक का सेवन नहीं किया जाता।

व्रत का समापन द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण के साथ किया जाता है। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना या जरूरतमंदों को दान देना पुण्यकारी माना गया है। एकादशी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि आत्मसंयम, सदाचार और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश भी देता है।

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