सनातन धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता और प्रथम पूज्य देव के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनकी पूजा से की जाती है। उनके जन्म को लेकर विभिन्न पुराणों में अनेक कथाएँ मिलती हैं जो भले ही अलग-अलग प्रतीत हों लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है भगवान गणेश की दिव्यता, महिमा और लोककल्याणकारी स्वरूप को स्थापित करना।
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने उबटन से एक दिव्य आकृति बनाई और उसे पुत्र रूप में स्वीकार किया। गंगा में प्रवाहित होते ही वह दिव्य देव के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा जी द्वारा ‘गणेश’ नाम प्रदान किया गया।
लिंग पुराण में गणेश का प्राकट्य दैत्यों के अत्याचारों को रोकने के लिए हुआ बताया गया है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न गजमुखी देव को विघ्नहर्ता का दायित्व सौंपा गया।
ब्रह्मवैवर्त, स्कंद और शिव पुराण गणेश की महिमा, उनके विवाह और ‘शुभ-लाभ’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से समृद्धि और मंगल का संदेश देते हैं।गणेश चालीसा में जन्म कथा अधिक भावनात्मक है, जहाँ शनि दृष्टि के कारण बालक का सिर कट जाता है और बाद में हाथी का सिर लगाकर उन्हें जीवनदान मिलता है।
वराह पुराण में सृष्टि संतुलन के प्रतीक के रूप में गणेश का गजमुख और विशाल उदर बताया गया है।
सबसे प्रसिद्ध कथा शिव पुराण की है जिसमें पार्वती द्वारा रचित बालक, शिव द्वारा सिर विच्छेदन और पुनर्जीवन की घटना आती है। यही कथा गणेश को प्रथम पूज्य और गणों का अधिपति बनाती है।
इन सभी कथाओं का सार यही है कि भगवान गणेश बाधाओं को दूर करने वाले, बुद्धि और विवेक के प्रतीक तथा भक्तों के रक्षक हैं। विविध कथाओं के माध्यम से वे हमें यह सिखाते हैं कि भक्ति, संयम और करुणा से ही जीवन के विघ्न दूर होते हैं।