बहुत समय पहले की बात है। पांडव अपने कठिन दिनों में एक चक्रा नगरी में ब्राह्मणों के वेष में रहते थे। तभी उन्हें यह समाचार मिला कि पांचाल देश में राजा द्रुपद अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित करने जा रहे हैं। यह सुनकर पांडव भी ब्राह्मणों के साथ वहां पहुंच गए और एक कुम्हार की झोंपड़ी में ठहरे।
स्वयंवर का दिन आया। विशाल मंडप सजा हुआ था। बीच में एक भारी धनुष रखा था और ऊपर घूमती हुई सोने की मछली टंगी थी। नीचे पानी से भरा पात्र रखा गया था। राजा द्रुपद ने घोषणा की कि जो वीर पानी में मछली की परछाईं देखकर उसकी आंख पर तीर मारेगा, वही द्रौपदी से विवाह करेगा।
दूर-दूर से राजा और योद्धा आए थे। एक-एक कर सभी ने कोशिश की लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। बड़े-बड़े वीर भी धनुष उठा न सके। जब कर्ण आगे बढ़े तो द्रौपदी ने साफ कहा कि वह सूतपुत्र से विवाह नहीं करना चाहतीं। कर्ण दुखी होकर लौट गए।
सभा में निराशा छा गई। तभी ब्राह्मणों के बीच से एक शांत और तेजस्वी युवक उठा। वह अर्जुन थे लेकिन किसी ने पहचाना नहीं। अर्जुन ने सहजता से धनुष उठाया प्रत्यंचा चढ़ाई और बिना देर किए पानी में प्रतिबिंब देखकर तीर चला दिया। देखते ही देखते मछली गिर पड़ी। पूरा मंडप तालियों और शंखनाद से गूंज उठा।
द्रौपदी प्रसन्न होकर आगे बढ़ीं और अर्जुन को वरमाला पहना दी। कुछ राजकुमार क्रोधित हो गए लेकिन भीम ने अर्जुन की रक्षा की। श्रीकृष्ण ने सबको शांत कराया।
द्रौपदी अर्जुन के साथ कुम्हार की झोंपड़ी पहुंचीं जहां माता कुंती को देखकर धृष्टद्युम्न समझ गए कि ये पांडव हैं। जब राजा द्रुपद को सच्चाई पता चली तो वे बहुत प्रसन्न हुए। कुंती की आज्ञा से द्रौपदी का विवाह पांचों पांडवों से हुआ।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची योग्यता पहचान छिपाने से भी नहीं छिपती और धैर्य व परिश्रम का फल अवश्य मिलता है।