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दस रुपये के एक नोट ने एक रात में बदल दी जिंदगी, दर्द से जन्मी दया ने लिया सेवा का संंकल्प

राणाघाट स्टेशन की एक घटना ने पापिया को बना दिया सैकड़ों लोगों की उम्मीद। 'ब्रेवरी अवार्ड' के लिए चुनी गयीं पापिया।

By सुनन्द घोष, Posted by: श्वेता सिंह

Feb 11, 2026 18:08 IST

कोलकाता: राणाघाट स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर छह, नवंबर 2008 की एक सर्द रात और एक दस रुपये का नोट-यही वह पल था। नदिया जिले की मजदिया की रहने वाली पापिया की जिंदगी एकदम से बदल गयी। कोलकाता के साइंस सिटी हैंडीक्राफ्ट मेले से पापिया सामान समेटकर लौट रही थी। अचानक राणाघाट स्टेशन के प्लेटफॉर्म के एक कोने में एक बुज़ुर्ग महिला को देखा। आसपास के लोगों से पता चला कि महिला कई दिनों से सिर्फ चाय और बिस्किट खाकर गुजारा कर रही थी।

पापिया ने वृद्धा से बातचीत करने की कोशिश की। उनके दर्द को शब्दों में जाहिर करना आसान नहीं था। भूख और थकान से परेशान महिला ने पापिया से कुछ भी लेने से इनकार किया। आखिरी ट्रेन पकड़ने की जल्दी में पापिया ने उनके हाथ में दस रुपये का नोट रख दिया। पापिया ने याद किया, “वह कुछ लेना नहीं चाहती थीं… शायद उनका स्वाभिमान आड़े आ रहा था।”

ट्रेन में बैठी पापिया ने देखा कि बुज़ुर्ग महिला उन्हें देखकर रो रही थी। उस रात पापिया सो नहीं सकीं। अगली सुबह, अपने पति अमरेश की सलाह पर, पापिया खुद मटन-चावल बनाकर स्टेशन पहुंचीं। लेकिन बहुत देर हो चुकी थी-दुर्भाग्यवश बुज़ुर्ग महिला की सुबह मृत्यु हो चुकी थी और उनके हाथ में वही दस रुपये का नोट था।

सैकड़ों लोगों के खाने की जिम्मेदारी

इस घटना ने पापिया को गहरे सदमे में डाल दिया। खुशमिजाज और संपन्न जीवन जी रही पापिया की दुनिया छह महीने के लिए थम सी गई। पति अमरेश ने उन्हें संभाला और उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ।

पापिया ने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी बदल दी। हर सुबह वह खाना बनाकर राणाघाट स्टेशन जातीं और भूखे लोगों को ढूंढ़ कर उन्हें भोजन करवातीं। धीरे-धीरे भूखे और जरूरतमंद लोगों की संख्या बढ़ गई।

राणाघाट में उनके दिवंगत पिता की एक दुकान थी। पापिया और उनकी मां ने इसे ‘बिना पैसे का होटल’ में बदल दिया। अब मां-बेटी मिलकर रोज करीब 100 लोगों को खाना खिलाती हैं। पापिया मजदिया से रोज ट्रेन पकड़कर राणाघाट आती हैं।

नेक काम के लिए पैसा कहां से आता है?

पापिया बताती हैं, “मेरे पति आधा खर्च उठाते हैं। मैं साल भर हाथ से बनी चीजें बनाती हूं और मेलों में बेचती हूं। पैसे कम पड़ते हैं, इसलिए मेन्यू उसी हिसाब से तय करना पड़ता है।”

उनका काम यहीं नहीं रुका। हर साल वह पेपर पल्प और अन्य सामग्रियों से दुर्गा प्रतिमाएं बनाती हैं। उनकी बिक्री से मिलने वाली राशि से गरीब बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे जाते हैं।

हर रविवार पापिया कोलकाता के धर्मतला स्थित ट्राम डिपो के पास ‘बिना पैसे की पाठशाला’ चलाती हैं। वहां बच्चों को पढ़ाती हैं और उनके जन्मदिन पर भोजन की व्यवस्था भी करती हैं।

‘ब्रेवरी अवॉर्ड’ से होगा सम्मान

पापिया के संघर्ष को अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। उन्हें बेंगलुरु से ‘ब्रेवरी अवॉर्ड’ दिया जा रहा है। हालांकि, पापिया ने बताया कि आर्थिक तंगी की वजह से 6 मार्च को उनके लिए बंगलोर जाकर पुरस्कार लेना संभव नहीं है।

2024 में कोलकाता के RG कर अस्पताल में एक युवा डॉक्टर की दुखद मौत के बाद बेंगलुरु में ‘टीम अभया’ का गठन हुआ। बंगाल, कर्नाटक, पंजाब सहित विभिन्न राज्यों की महिलाएं इस मंच से जुड़ी हैं। टीम की मुख्य लीडर पायल सेनगुप्ता के अनुसार, वे इस साल से कर्नाटक के कई सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए ‘पिंक रूम’ शुरू कर रही हैं, जहां पीरियड्स के दौरान डॉक्टरी सलाह मिलेगी। टीम को पापिया के संघर्ष का पता चला और उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया गया।

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