डुआर्सः उत्तर बंगाल के डुआर्स क्षेत्र में जहां चाय बागानों के बीच हाथियों की आमद अक्सर दहशत की वजह बनती है, वहीं उसी जमीन पर एक पहल ने डर को दोस्ती में बदलने की कोशिश की है।
जंगल से निकलकर भोजन की तलाश में बस्तियों तक पहुंचने वाले हाथियों को यहां के लोग अक्सर नुकसान और खतरे के प्रतीक के रूप में देखते हैं। दृष्टिबाधित और विशेष रूप से सक्षम दिव्यांग बच्चों ने भी बड़ों से यही सुना था-हाथी यानी घर तोड़ने वाला, फसल बर्बाद करने वाला ‘दुश्मन’। हालांकि धूपझोड़ा पिलखाना में आयोजित नाफ (NAF) के प्रकृति पाठ शिविर में यह धारणा बदलती नजर आई।
स्पर्श से शुरू हुई नई पहचान
शिविर के दूसरे दिन दिव्यांग बच्चों को हाथियों-जेनी और माधुरी के साथ समय बिताने का अवसर मिला। गयरकाटा चाय बागान के शिवनाथ लकड़ा और शर्मिला बाड़ा, नागराकाटा के विकास उरांव तथा ग्यान्द्रापाड़ा चाय बागान की सायना महाली जैसे बच्चों के लिए यह अनुभव बिल्कुल नया था।
अब तक जिन हाथियों के नाम से वे घरों में सिमट जाते थे, उन्हीं को उन्होंने आज छूकर, सूंघकर और महसूस करके जाना। हाथियों की त्वचा, उनकी सांसों की लय और उनके शांत स्वभाव ने बच्चों के मन में जमी भय की परतों को धीरे-धीरे हटाया।
शिवनाथ ने कहा, “हमारे घर के पास अक्सर हाथी आ जाते हैं। डर रहता है कि कहीं घर न तोड़ दें। लेकिन आज इतने करीब से उन्हें महसूस करने के बाद डर काफी कम हो गया है।”
देश की पहली महिला महावत रहीं विशेष आकर्षण
इस शिविर की विशेष आकर्षण रहीं देश की एकमात्र महिला महावत और प्रसिद्ध हस्ती विशेषज्ञ पार्वती बरुआ। उन्होंने बच्चों को हाथियों के जीवनचक्र, उनके व्यवहार और संवेदनशील स्वभाव के बारे में सरल भाषा में समझाया।
पार्वती बरुआ ने कहा, “मानव और हाथी का सहअस्तित्व ही भविष्य में संघर्ष को कम कर सकता है। हाथी अत्यंत संवेदनशील प्राणी हैं और कई स्थानों पर मनुष्यों के साथ उनका शांतिपूर्ण सहअस्तित्व देखा जा रहा है।” माहुतों की मदद से बच्चों ने न केवल हाथियों के बारे में सीखा, बल्कि उनके संरक्षण का संकल्प भी लिया।
हाथियों से रिश्ता जोड़ने की कोशिश
नाफ के प्रवक्ता अनिमेष बसु के अनुसार, समाज में हाथियों को लेकर कई नकारात्मक धारणाएं हैं। बच्चे भी यही सीखते हैं कि हाथी आक्रामक होते हैं। इस शिविर का उद्देश्य कहानी और स्पर्श के माध्यम से हाथियों की जीवनशैली को समझाना और उनके साथ एक आत्मीय रिश्ता बनाना था।
डुआर्स के चाय बागान क्षेत्र में जहां मानव-हाथी संघर्ष एक सामान्य समस्या है, वहां इस तरह की पहल सहअस्तित्व की दिशा में उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है।