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दर्द को संकल्प में बदलतीं और हरियाली से भविष्य गढ़तीं सुंदरबन की बाघ विधवाएं

जलवायु परिवर्तन, घटती आजीविका और बाघ-मानव संघर्ष के बीच मैंग्रोव बनीं उम्मीद की नई राह।

By श्वेता सिंह

Feb 21, 2026 09:41 IST

गोसाबा, सुंदरबनः खारे पानी से भीगी मिट्टी में घुटनों तक धंसकर जब महिलाएं मैंग्रोव के नन्हे पौधे रोपती हैं, तो यह केवल पौधारोपण नहीं होता-यह उनके भीतर जमा दर्द को धरती में बोने और उससे उम्मीद उगाने की कोशिश होती है। इन महिलाओं को स्थानीय तौर पर ‘बाघ विधवा’ कहा जाता है। यह वे महिलाएं हैं, जिन्होंने अपने पति को जंगल में बाघ के हमले में खो दिया, लेकिन जीवन की जंग से पीछे नहीं हटीं।

सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है। भारत और बांग्लादेश में फैला यह इलाका लगभग 45 लाख लोगों की आजीविका का आधार है। यहां जीवन का रिश्ता नदी, ज्वार-भाटा और जंगल से जुड़ा है। लोग मछली पकड़ते हैं, केकड़े और झींगे इकट्ठा करते हैं, शहद निकालते हैं। इसी जंगल में रॉयल बंगाल टाइगर का भी घर है। जब रोजगार की मजबूरी और वन्यजीव संरक्षण की सीमाएं टकराती हैं, तो सबसे बड़ी कीमत गरीब परिवार चुकाते हैं।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल औसतन 20 से 50 लोग बाघों के हमलों में मारे जाते हैं। कई मामलों में यह संख्या इससे अधिक बताई जाती है। जो पुरुष जंगल से वापस नहीं लौटते, उनके पीछे छूट जाती हैं उनकी पत्नियां-आर्थिक, सामाजिक और मानसिक संकट से जूझती हुईं।

पति की मौत के बाद इन महिलाओं का संघर्ष कई स्तरों पर शुरू होता है। पहला संकट होता है आय का। परिवार का मुख्य कमाने वाला अचानक चला जाता है। छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, बूढ़े माता-पिता की देखभाल और कर्ज का बोझ एक साथ सिर पर आ गिरता है।

दूसरा संकट सामाजिक है। कई गांवों में इन्हें अशुभ माना जाता है। ‘स्वामी-खेजो’ जैसे अपमानजनक शब्द उनके लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कई महिलाएं बताती हैं कि शुभ कामों में उन्हें बुलाया नहीं जाता, त्योहारों में दूरी बना ली जाती है।

तीसरा संकट कानूनी और प्रशासनिक है। मुआवजा पाने के लिए जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। यदि मृतक के पास वैध परमिट नहीं था, तो परिवार को मुआवजा मिलने में कठिनाई आती है। गरीबी के कारण कई पुरुष बिना अनुमति के जंगल में जाते हैं। उनके परिवार हादसे के बाद दस्तावेजों और जांच की लंबी प्रक्रिया में उलझ जाते हैं।

पुर्बाषा इको हेल्पलाइन सोसाइटी (पीईएचएस) जैसी स्थानीय संस्थाएं इन महिलाओं को संगठित करने का प्रयास कर रही हैं। संस्था राशन सहायता, बच्चों की शिक्षा, कानूनी मार्गदर्शन और वैकल्पिक आजीविका के प्रशिक्षण उपलब्ध कराती है। मधुमक्खी पालन, बकरी पालन, सिलाई और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आय के नए रास्ते खोले जा रहे हैं।

इस पूरे संकट की जड़ में जलवायु परिवर्तन की गहरी छाया भी है। पिछले कुछ दशकों में समुद्र स्तर बढ़ा है और लगभग 210 वर्ग किलोमीटर जमीन समुद्र में समा चुकी है। चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है। ‘आइला’ जैसे तूफानों ने गांवों को उजाड़ दिया, खेतों में नमक जमा हो गया और खेती की जमीन बंजर हो गई।

पानी में बढ़ती लवणता के कारण धान की खेती कम होती जा रही है। मछलियों की संख्या घट रही है। ऐसे में पुरुषों को जंगल के भीतर और गहराई तक जाना पड़ता है। इससे बाघों से टकराव की आशंका बढ़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तापमान और समुद्र स्तर बढ़ता रहा, तो बाघों का प्राकृतिक आवास सिमटेगा और संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

इसी पृष्ठभूमि में मैंग्रोव रोपण अभियान एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है। 2009 के बाद बड़े पैमाने पर पौधारोपण शुरू हुआ। मैंग्रोव पेड़ तटीय क्षेत्रों के लिए प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं। वे चक्रवात की गति कम करते हैं, समुद्री लहरों की ताकत घटाते हैं और तटीय कटाव रोकते हैं। साथ ही, वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने में भी भूमिका निभाते हैं।

आज कई बाघ विधवाएं इस हरित अभियान की अग्रिम पंक्ति में हैं। वे स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से पौधे तैयार करती हैं, उन्हें रोपती हैं और उनकी देखभाल करती हैं। यह काम उन्हें मामूली आय देता है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है आत्मसम्मान। वे कहती हैं कि यह काम उन्हें महसूस कराता है कि वे सिर्फ पीड़ित नहीं, बल्कि परिवर्तन की भागीदार हैं।

कई महिलाएं बताती हैं कि जब वे अपने बच्चों को स्कूल भेज पाती हैं या घर के खर्च में योगदान दे पाती हैं, तो उन्हें नई ताकत मिलती है। मैंग्रोव उनके लिए सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच हैं-ऐसा कवच जो शायद भविष्य में उनके बच्चों को वही जोखिम उठाने से बचा सके।

सुंदरबन की बाघ विधवाओं की कहानी केवल व्यक्तिगत शोक की कहानी नहीं है। यह जलवायु संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक संरचना की जटिलताओं की कहानी भी है। यह बताती है कि प्राकृतिक आपदाओं और वन्यजीव संघर्ष का बोझ सबसे अधिक हाशिए पर खड़े समुदायों पर पड़ता है, खासकर महिलाओं पर।

इन महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन की भी आवश्यकता है। मुआवजा प्रक्रिया को सरल बनाने, सुरक्षित और टिकाऊ रोजगार उपलब्ध कराने और जलवायु अनुकूलन की योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है।

खारे पानी और दलदली जमीन के बीच रोपे गए ये नन्हे मैंग्रोव पौधे इस बात के प्रतीक हैं कि दर्द को संकल्प में बदला जा सकता है। सुंदरबन की ये महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि जिनके जीवन में जंगल ने गहरा घाव दिया, वही जंगल उनके हाथों से फिर से हरा-भरा हो सकता है। यह संघर्ष केवल हरियाली उगाने का नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षित भविष्य गढ़ने का है।

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