लंदन : 2020 के मई महीने की बात है, इंग्लैंड के समरसेट तट पर पिता जस्टिन के साथ उनकी 11 साल की बेटी रूबी, रूबी रेनॉल्ड्स घूम रही थी। ‘ब्लू एंकर’ नाम से पहचाना जाने वाला यह समुद्र तट ‘जीवाश्मों का स्वर्ग’ कहलाता है।
वहां जरा ध्यान से देखने पर ही अलग तरह के पत्थर के टुकड़े नजर आ जाते हैं। उन टुकड़ों को तोड़ने पर दिखता है कि करोड़ों साल पहले मरे किसी जीव के अवशेषों को प्रकृति ने पत्थरों में सहेज कर रखा है। पेशेवर जीवाश्म खोजकर्ताओं (पैलियोन्टोलॉजिस्ट) के साथ-साथ जस्टिन जैसे कई लोग शौकिया तौर पर भी इस इलाके में फॉसिल की तलाश करते रहते हैं। जस्टिन को अक्सर इस खोज में अपनी बेटी रूबी का साथ मिलता है।
उस दिन रूबी की नजर ऐसे ही एक पत्थर बने हड्डी के टुकड़े पर पड़ी, जो किसी भी फॉसिल-शिकारी के लिए ईर्ष्या का कारण बन सकता है। बन सकता है नहीं, बन चुका है। नाबालिग की यह खोज प्रागैतिहासिक जीव-जगत को लेकर प्रचलित धारणाओं को काफी हद तक बदलने वाली है। क्योंकि यह अब तक मिले सबसे बड़े समुद्री सरीसृप का जीवाश्म है।
छह साल पहले के उस दिन की याद आज भी रूबी और जस्टिन को अच्छी तरह है। समुद्र किनारे टहलते समय उन्हें करीब चार इंच लंबा एक हड्डी का जीवाश्म मिला था। बाद में उन्होंने उस वस्तु की तस्वीर जीवाश्म शोधकर्ता डीन लोमैक्स को भेजी, जिसके बाद मामला नई दिशा में बढ़ने लगा।
समुद्री सरीसृपों पर लंबे समय से काम करने का अनुभव लोमैक्स को है, इसलिए उन्हें पहचानने में देर नहीं लगी। लोमैक्स के अनुसार उन्होंने सही पहचाना था। वह हड्डी एक प्रकार के समुद्री सरीसृप की है, जिसका नाम इच्थियोसॉर है। इस प्रजाति के सरीसृप ट्रायसिक युग में, यानी 25 करोड़ से 20 करोड़ वर्ष पहले तक समुद्र पर राज करते थे।’
समरसेट में उस दिन जिस जीव का जीवाश्म रूबी ने देखा था, उसका नाम इच्थियोटाइटन सेवरनेन्सिस है। इसकी लंबाई लगभग 82 फुट थी—आकार में आज के नीली व्हेल के बराबर। जीवाश्म विज्ञान की जड़ों को हिला देने वाली इस खोज की पुष्टि प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित एक शोध पत्र में की गई है। हालांकि, इच्थियोटाइटन सेवरनेन्सिस की कहानी सिर्फ रूबी की खोज तक सीमित नहीं है।
2016 में समरसेट में इसी प्रजाति के जीव के जबड़े की हड्डी का एक हिस्सा स्थानीय संग्रहकर्ता पॉल डे ला साल ने पाया था। रूबी द्वारा मिले जीवाश्म की तुलना उस पुराने खोज से करने पर स्पष्ट हो गया कि वे एक ही प्रजाति के हैं। बाद में जबड़े की हड्डियों के विश्लेषण से पता चला कि उनका आकार और संरचना उस समय के अन्य सामान्य समुद्री सरीसृपों से कहीं अधिक बड़ा और अलग था।
लोमैक्स के अनुसार इस नई खोज से पता चलता है कि यह जीव ‘असामान्य और अत्यंत विशाल आकार का था’। केवल उसके जबड़े की हड्डी ही लगभग साढ़े छह फुट से अधिक लंबी थी। संभवतः उसकी खोपड़ी 10 फुट से भी अधिक लंबी थी। और पैडल जैसे पंख उसे विशाल समुद्र में तेजी से चलने में मदद करते थे। हड्डियों के इन मापों से स्पष्ट होता है कि इच्थियोटाइटन सेवरनेन्सिस अपने समय के समुद्र में रहने वाले सबसे बड़े जीवों में से एक था।
इसकी शारीरिक बनावट से यह भी संकेत मिलता है कि वे खुले समुद्र में लंबी दूरी तय करने के अभ्यस्त थे और आकार में संभवतः आज की नीली व्हेल का मुकाबला कर सकते थे। माना जाता है कि उस समय प्रचुर मात्रा में मौजूद स्क्विड जैसे सेफालोपोड जीवों का शिकार करके ही इच्थियोटाइटन सेवरनेन्सिस जीवित रहता था।
जीवाश्म शोधकर्ता आशान्वित हैं कि भविष्य में खुदाई के जरिए इस प्रकार के और भी जीवाश्म मिलेंगे, जो इस विशाल जीव के बारे में और नई तथा चौंकाने वाली जानकारियां सामने लाएंगे।