वाशिंग्टनः अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव अब तीसरे सप्ताह में पहुंच गया है और इसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए थे। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेताओं के मारे जाने की खबर सामने आई।
युद्ध के बढ़ते दायरे के साथ ही अमेरिका के भीतर भी राजनीति गरमा गयी है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले को लेकर देश के भीतर समर्थन से ज्यादा विरोध देखने को मिल रहा है। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार 53 से 59 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक इस युद्ध के खिलाफ हैं, जबकि केवल 36 से 41 प्रतिशत लोग ही ट्रंप के फैसले का समर्थन कर रहे हैं।
इस बीच युद्ध के मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इस संघर्ष में कम से कम 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है। साथ ही तेल की कीमतों में तेज उछाल और शेयर बाजारों में गिरावट ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी झटका दिया है। इन परिस्थितियों ने ट्रंप प्रशासन को राजनीतिक रूप से बहुत संकट में डाल दिया है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने हमेशा की तरह मीडिया पर तीखा हमला करना जारी रखा है। उन्होंने कहा कि मीडिया चाहता है कि अमेरिका यह युद्ध हार जाए। हालांकि उनके कुछ रिपब्लिकन समर्थक भी अब सवाल उठाने लगे हैं। मीडिया हस्तियों टकर कार्लसन और मेगिन केली जैसे नामों ने भी युद्ध को लेकर चिंताएं जताई हैं।
पिछले कुछ दिनों से चल रहे युद्ध का घातक परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा है। युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से टैंकर जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।
शुरुआत में ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी नौसेना के जरिए टैंकरों की सुरक्षा का आश्वासन दिया था, लेकिन अब उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन सहित कई देशों से अपने युद्धपोत भेजने की अपील की है। ब्रिटेन ने सहयोग की बात तो कही है, लेकिन अभी तक किसी ठोस संयुक्त योजना की घोषणा नहीं हुई है।
इसी दौरान अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर स्थित सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमले किए हैं। यह द्वीप ईरान के लिए एक बड़ा तेल निर्यात केंद्र माना जाता है। हालांकि अभी तक तेल से जुड़ी सुविधाओं को सीधे निशाना नहीं बनाया गया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान अपनी कार्रवाई नहीं रोकता तो भविष्य में तेल प्रतिष्ठानों पर भी हमला किया जा सकता है।
युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में भी तेज उछाल दर्ज किया गया है। 11 से 12 मार्च 2026 के बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 90 से 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो युद्ध से पहले के स्तर से काफी ज्यादा है। इसका सीधा असर अमेरिका समेत कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा है।
अमेरिका में बढ़ती ईंधन कीमतों ने महंगाई की आशंका को भी बढ़ा दिया है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि युद्ध खत्म होने के बाद तेल की कीमतें फिर से नीचे आ सकती हैं, लेकिन फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने तेल भंडार से आपूर्ति बढ़ाने की बात कही है, लेकिन स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ पाई है।