कोलकाताः पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के ऐलान के साथ ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से जारी 144 उम्मीदवारों की पहली सूची ने चुनावी मुकाबले को नई धार दी है। इस सूची का सबसे अहम और चर्चित फैसला भवानीपुर सीट को लेकर सामने आया है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को उम्मीदवार बनाया गया है। इस कदम ने चुनाव को एक साधारण राजनीतिक प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर प्रतिष्ठा की सीधी लड़ाई में बदल दिया है।
भवानीपुर: सुरक्षित सीट पर सीधी चुनौती
कोलकाता स्थित भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र को लंबे समय से ममता बनर्जी का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता रहा है। 2021 के उपचुनाव में उन्होंने यहां से 58 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज कर विधानसभा में वापसी की थी। ऐसे में इस सीट पर किसी बड़े चेहरे को उतारना भाजपा के लिए रणनीतिक अनिवार्यता था।
शुभेंदु अधिकारी को यहां उतारकर पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह मुख्यमंत्री को उनके सबसे मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में ही घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।
शुभेंदु अधिकारी: नंदीग्राम की जीत से मिली मजबूती
शुभेंदु अधिकारी का नाम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम की जीत के बाद और मजबूत हुआ। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने ममता बनर्जी को लगभग 1,900 मतों से हराया था। यह जीत प्रतीकात्मक और राजनीतिक-दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण थी।
नंदीग्राम का इतिहास भी इस लड़ाई को खास बनाता है। 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से ममता बनर्जी के राजनीतिक उभार की शुरुआत यहीं से हुई थी। ऐसे में उसी क्षेत्र में हार और अब भवानीपुर में चुनौती-यह पूरा घटनाक्रम चुनावी कथा को और गहरा बनाता है।
दो सीटों से चुनाव: रणनीति या जोखिम?
भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर से भी उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा दांव खेला है। पार्टी का मानना है कि अधिकारी का जमीनी नेटवर्क, खासकर तटीय और जंगलमहल क्षेत्रों में उनकी पकड़, पार्टी को फायदा मिल सकता है।
हालांकि, दो सीटों से चुनाव लड़ना अपने आप में एक जोखिम भी है, क्योंकि इससे मुकाबले की जटिलता बढ़ जाती है और संसाधनों का बंटवारा भी चुनौती बनता है।
सियासी रिश्तों का बदलता समीकरण
शुभेंदु अधिकारी कभी तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और ममता सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। उन्हें ममता बनर्जी के करीबी सहयोगियों में गिना जाता था। लेकिन 2021 से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया और तब से वे बनर्जी के सबसे मुखर आलोचक बन गए हैं।
इस पृष्ठभूमि के चलते भवानीपुर की संभावित टक्कर केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक आयाम भी लिए हुए है।
मतदाता सूची में बदलाव और उसका असर
हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, भवानीपुर में मतदाता सूची संशोधन के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। जनवरी 2025 में दर्ज 2,06,295 मतदाताओं में से 44,787 नाम हटाए गए, जो राज्य में सबसे अधिक है। इसके मुकाबले नंदीग्राम में 2,78,212 मतदाताओं में से 10,599 नाम हटाए गए।
इन आंकड़ों को देखते हुए राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से चुनावी गणित का आकलन कर रहे हैं, क्योंकि मतदाता संरचना में बदलाव सीधे परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा की पहली सूची में पुराने चेहरों को मौका
भाजपा की पहली सूची में कई मौजूदा विधायकों और पुराने चेहरों को दोबारा मौका दिया गया है। खड़गपुर सदर से दिलीप घोष, आसनसोल दक्षिण से अग्निमित्रा पाल और शालतोड़ा से चंदना बाउरी जैसे नेताओं को फिर टिकट दिया गया है। इसके अलावा, पार्टी ने विभिन्न जिलों में संतुलन साधते हुए उम्मीदवारों का चयन किया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह संगठनात्मक मजबूती और क्षेत्रीय समीकरण-दोनों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रही है।
चुनाव का बदलता फोकस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी को उतारने का निर्णय चुनाव को “नेतृत्व बनाम नेतृत्व” की लड़ाई में बदल सकता है। इससे स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ व्यक्तिगत विश्वसनीयता, राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक क्षमता भी केंद्र में आ सकती है।
अब नजर तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार सूची पर है। यदि ममता बनर्जी स्वयं भवानीपुर से मैदान में उतरती हैं, तो यह मुकाबला सीधे तौर पर राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन जाएगा।
भवानीपुर सीट पर संभावित ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी मुकाबला पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 का सबसे चर्चित और निर्णायक संघर्ष बनता दिख रहा है। यह लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राज्य की राजनीतिक दिशा और शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।