नई दिल्ली: लोकसभा ने सोमवार को इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक 2025 को पारित कर दिया। यह विधेयक सिलेक्ट कमिटी की सिफारिशों के आधार पर लाया गया है, जिसमें दिवालियापन प्रक्रिया को और प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने के लिए 12 अहम संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि 2016 में लागू IBC को मौजूदा जरूरतों के अनुरूप मजबूत करना जरूरी था। इन संशोधनों का उद्देश्य व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करना, अदालतों और ट्रिब्यूनल के अनुभवों को शामिल करना और वैश्विक स्तर की सर्वोत्तम प्रक्रियाओं को अपनाना है।
IBC ने सुधारी बैंकिंग सेहत, रिकवरी में बड़ा योगदान
सरकार के अनुसार, IBC ने बैंकिंग क्षेत्र के फंसे कर्ज (NPA) की वसूली में अहम भूमिका निभाई है। शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों ने विभिन्न माध्यमों से 1,04,099 करोड़ रुपये की रिकवरी की, जिसमें अकेले IBC का योगदान 54,528 करोड़ रुपये यानी 52.3 प्रतिशत रहा।
दिसंबर 2025 तक IBC के तहत 1,376 कंपनियों का सफल समाधान किया जा चुका है, जिससे कुल 4.11 लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई। आर्थिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक, बंद मामलों में 57 प्रतिशत कंपनियों को चालू इकाई के रूप में बचाया गया।
रिजॉल्यूशन प्लान के तहत वित्त वर्ष 2024-25 में रिकवरी दर 36.6 प्रतिशत रही, जो पिछले वर्षों से बेहतर है। इसके अलावा, IBC के तहत समाधान के बाद कंपनियों की बिक्री में 89 प्रतिशत, एसेट टर्नओवर में 131 प्रतिशत और पूंजी निवेश में 106 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
छोटे कारोबारों के लिए नया फ्रेमवर्क, प्रक्रिया होगी तेज
संशोधन विधेयक में फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया की जगह क्रेडिटर-इनिशिएटेड इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क लाया गया है, जिससे छोटी कंपनियों के मामलों का तेजी से निपटारा हो सकेगा।
इसमें आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट और डेब्टर-इन-पजेशन मॉडल को शामिल किया गया है। इसके तहत कंपनी का मौजूदा प्रबंधन ही संचालन जारी रख सकेगा, लेकिन उस पर सख्त निगरानी और तय समयसीमा लागू होगी।
पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर जोर
विधेयक में कई ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं, जो पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएंगे। कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) को अब अपने फैसलों के पीछे कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा।
इसके अलावा, दिवालियापन आवेदनों को 14 दिनों के भीतर स्वीकार या खारिज करने की समयसीमा तय की गई है। किसी मामले को वापस लेने के लिए 90 प्रतिशत CoC की मंजूरी जरूरी होगी।
लिक्विडेशन प्रक्रिया को भी सरल और व्यवस्थित किया गया है, ताकि मामलों का निपटारा तेजी से हो सके।
वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने की तैयारी
विधेयक में ग्रुप इनसॉल्वेंसी और क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी के लिए भी स्पष्ट फ्रेमवर्क बनाया गया है। इससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही, सिक्योरिटी इंटरेस्ट की परिभाषा को स्पष्ट किया गया है, जिसमें केवल अनुबंध आधारित दावों को शामिल किया गया है। सर्विस प्रोवाइडर्स, जैसे रजिस्टर्ड वैल्यूअर्स, को भी विनियमित करने का प्रावधान किया गया है।
सिलेक्ट कमिटी की 11 प्रमुख सिफारिशों को सरकार ने स्वीकार किया है, जिनमें अपीलों के निपटारे के लिए 3 महीने की समयसीमा भी शामिल है।
अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में अहम कदम
सरकार का मानना है कि इन संशोधनों से दिवालियापन प्रक्रिया में देरी कम होगी, कंपनियों की वैल्यू बेहतर तरीके से संरक्षित होगी और निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।
वित्त मंत्री ने कहा कि IBC पहले ही कंपनियों को बंद होने से बचाने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा चुका है। नए संशोधनों के लागू होने से क्रेडिटर्स, शेयरधारकों और कर्मचारियों- सभी के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी।