भारत में उर्वरकों के आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। अब राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) के तहत केंद्र सरकार हर साल 7.24 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया खरीदने की योजना बना रही है।
बताया जाता है कि इस ग्रीन अमोनिया का इस्तेमाल देश में ग्रीन यूरिया के उत्पादन में किया जाएगा। इसके साथ ही सरकार विदेशी उर्वरकों पर निर्भरता को कम करने और पर्यावरण अनुकूल दूसरे टिकाऊ कृषि विकल्पों को बढ़ावा देना चाहती है।
बता दें, ग्रीन अमोनिया का उत्पादन रिन्यूएबल ऊर्जा की मदद से किया जाता है। पारंपरिक अमोनिया की तुलना में इसके उत्पादन के दौरान कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है।
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इसी ग्रीन अमोनिया को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल कर ग्रीन यूरिया तैयार किया जाएगा। इससे उर्वरकों का उत्पादन अधिक पर्यावरण-अनुकूल होगा और आयात पर होने वाला खर्च भी कम होगा।
रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के अनुसार इस परियोजना के तहत सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) पारदर्शी ई-रिवर्स ऑक्शन प्रक्रिया के माध्यम से ग्रीन अमोनिया की खरीद करेगा। इसके बाद इस ग्रीन अमोनिया को देश की उर्वरक निर्माण कंपनियों को उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया उद्योगों में निजी निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा।
बताया जाता है कि ग्रीन अमोनिया का उत्पादन खर्च अभी भी पारंपरिक अमोनिया की तुलना में अधिक है। इसलिए दोनों की कीमतों के अंतर को कम करने के लिए सरकार सब्सिडी देने की व्यवस्था भी कर सकती है। इसके साथ ही परियोजना के विभिन्न चरणों के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि नई कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित हो।
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हाल ही में उर्वरक विभाग (Department of Fertilisers) ने सरकारी और निजी कंपनियों के साथ एक बैठक की। इस बैठक में देश में ग्रीन यूरिया के उत्पादन के लिए रोडमैप बनाने पर चर्चा की गयी। इसके साथ ही नए ग्रीन यूरिया संयंत्र को स्थापित करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) भी आमंत्रित किए गए हैं।
जानकारों का मानना है कि यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की उर्वरक आयात पर निर्भरता में कमी आ सकती है। साथ ही कृषि क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को भी कम किया जा सकेगा। इससे देश के ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग को नई गति मिलेगी। इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।