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आरबीआई ने तय की नई सीमा, 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति वाले एनबीएफसी होंगे अपर लेयर में शामिल

नए ढांचे से टाटा संस जैसी बड़ी कंपनियों पर बढ़ सकती हैं नियामकीय जिम्मेदारियां; प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण एनबीएफसी पर होगी कड़ी निगरानी।

By श्वेता सिंह

Jun 25, 2026 12:01 IST

मुंबईः भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के वर्गीकरण से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक परिसंपत्ति आकार वाली कंपनियों को स्वतः 'अपर लेयर' श्रेणी में रखा जाएगा। केंद्रीय बैंक का यह संशोधित ढांचा 24 जून से प्रभावी हो गया है।

आरबीआई के इस फैसले का असर देश की कुछ सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं पर पड़ सकता है। विशेष रूप से टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस पर इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। अनुमानित 1.75 लाख करोड़ रुपये की परिसंपत्तियों के साथ टाटा संस नई सीमा से काफी ऊपर है, जिससे उसके अपर लेयर एनबीएफसी बने रहने की संभावना मजबूत हो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से टाटा संस के लिए नियामकीय छूट हासिल करने की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। कंपनी पहले ही कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) के रूप में अपना पंजीकरण वापस लेने के लिए नियामकीय मंजूरी मांग चुकी है। ऐसे में नए नियम भविष्य की रणनीति पर असर डाल सकते हैं।

आरबीआई ने कहा है कि संशोधित व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी पद्धति विकसित करना है, जो पारदर्शी, सरल और वस्तुनिष्ठ हो। अब अपर लेयर श्रेणी की पहचान के लिए जटिल मानकों के बजाय सीधे परिसंपत्ति आकार को आधार बनाया जाएगा। इससे वर्गीकरण प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य बनेगी।

केंद्रीय बैंक ने यह भी तय किया है कि 1 लाख करोड़ रुपये की सीमा की समीक्षा अब हर तीन वर्ष में की जाएगी। इससे पहले मसौदा प्रस्ताव में यह समीक्षा पांच वर्ष के अंतराल पर करने का सुझाव दिया गया था।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव के तहत पात्रता पूरी करने वाली सरकारी स्वामित्व वाली एनबीएफसी को भी अपर लेयर श्रेणी में शामिल किया जा सकेगा। हालांकि, ऐसे सरकारी संस्थानों पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की अनिवार्यता लागू नहीं होगी।

स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत अपर लेयर में शामिल संस्थाओं पर अधिक कड़ी निगरानी, सख्त अनुपालन मानक और अतिरिक्त नियामकीय दायित्व लागू होते हैं। आरबीआई का मानना है कि बड़े और प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण एनबीएफसी पर बेहतर निगरानी से वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता और मजबूती बढ़ेगी।

नए नियमों के जरिए केंद्रीय बैंक वित्तीय प्रणाली में जोखिम प्रबंधन को और मजबूत करने के साथ-साथ बड़े वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

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