नई दिल्लीः यदि आप दिल्ली में जीवित पालतू पशुओं की खरीद-बिक्री या उन्हें प्रदर्शित करने वाली पेट शॉप खोलना चाहते हैं तो सिर्फ दुकान खोलना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए दो अलग-अलग मंजूरियां लेना अनिवार्य है। हालांकि, नियम लागू होने के करीब आठ साल बाद भी राजधानी में यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है।
पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण (पेट शॉप) नियम, 2018 के तहत हर ऐसी दुकान को पहले दिल्ली पशु कल्याण बोर्ड (डीएडब्ल्यूबी) से पंजीकरण और उसके बाद नगर निगम दिल्ली (एमसीडी) से व्यापार लाइसेंस लेना होता है। लेकिन एमसीडी की लाइसेंस नीति अब तक मंजूर नहीं होने के कारण प्रक्रिया अधूरी है। अब तक केवल 42 दुकानों को ही पंजीकरण प्रमाणपत्र मिला है, जबकि किसी भी दुकान को व्यापार लाइसेंस जारी नहीं किया गया है।
पशुपालन विभाग के अधिकारियों के अनुसार पंजीकरण पाने वाले दुकानदारों को लाइसेंस के लिए एमसीडी भेजा जाता है, लेकिन वहां अभी लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था ही नहीं है। दूसरी ओर, एमसीडी का कहना है कि लाइसेंस नीति का मसौदा तैयार है। परामर्श के दौरान मिले सुझावों को शामिल कर लिया गया है और जल्द ही इसे सदन की मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा।
दिल्ली पशु कल्याण बोर्ड के मुताबिक करीब 250 दुकानदारों ने शपथपत्र देकर बताया है कि वे केवल पालतू पशुओं का भोजन, एक्सेसरीज और ग्रूमिंग उत्पाद बेचते हैं तथा जीवित पशुओं का कारोबार नहीं करते। इसलिए उन पर पंजीकरण के नियम लागू नहीं होते। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि शिकायत या निरीक्षण के दौरान यदि जीवित पशुओं की बिक्री पाई जाती है तो कार्रवाई की जा सकती है।
पशु कल्याण कार्यकर्ता आशेर जेसुदास का कहना है कि केवल दुकानदारों के दावे पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। नियमित निरीक्षण और सख्त निगरानी से ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।
नियमों के अनुसार पंजीकृत पेट शॉप में पर्याप्त वेंटिलेशन, स्वच्छ भोजन और पानी, पशु चिकित्सक की निगरानी, समय पर टीकाकरण, प्रजाति के अनुसार रहने की व्यवस्था और प्रत्येक खरीदे-बेचे गए पशु का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है। पंजीकरण के तीन महीने के भीतर पहली जांच और उसके बाद हर साल कम से कम एक निरीक्षण भी जरूरी है।
हालांकि अधिकारियों का कहना है कि पशु चिकित्सकों की कमी के कारण नियमित निरीक्षण कराना चुनौती बना हुआ है। सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों को ही निरीक्षण की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है।
पशु अधिकार समूहों का दावा है कि कई दुकानों में पशुओं को अनुपयुक्त परिस्थितियों में रखा जाता है और कुछ मामलों में संरक्षित वन्यजीव प्रजातियों की बिक्री के संकेत भी मिले हैं। उनका कहना है कि कमजोर निगरानी के कारण गैर-पंजीकृत ब्रीडिंग सेंटरों से आने वाले पिल्लों के कारोबार पर भी प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नियमों का उद्देश्य केवल पेट शॉप का पंजीकरण नहीं, बल्कि पशुओं के कल्याण के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा भी है। इसलिए लाइसेंस व्यवस्था जल्द लागू कर विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना आवश्यक है।