नई दिल्लीः कार्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी कंपनी (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी नीति) संशोधन नियम, 2026 के तहत 27 मई 2026 से नई व्यवस्था लागू हो चुकी है।
इस बदलाव का मूल उद्देश्य CSR को केवल कानूनी अनुपालन तक सीमित न रखकर उसे एक प्रभावी सामाजिक निवेश प्रणाली बनाना है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में अधिक संगठित फंडिंग पहुंच सके।
ZCZP इंस्ट्रूमेंट और सोशल स्टॉक एक्सचेंज की भूमिका
नए ढांचे में “जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल इंस्ट्रूमेंट” (ZCZP) को CSR फंडिंग का एक नया माध्यम बनाया गया है। इसे सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) के जरिए लागू किया गया है।
यह एक ऐसा वित्तीय साधन है, जिसमें निवेश करने पर न तो ब्याज मिलता है और न ही मूलधन वापस आता है। इसका पूरा उद्देश्य सामाजिक परियोजनाओं को समर्थन देना है।
इस व्यवस्था के तहत मान्यता प्राप्त गैर-लाभकारी संगठन (NPO) SSE पर पंजीकरण के बाद फंड जुटा सकते हैं। कंपनियां अपने कुल CSR खर्च का अधिकतम 10 प्रतिशत ही इस माध्यम से उपयोग कर सकती हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यह मॉडल CSR को पारंपरिक दान प्रणाली से आगे ले जाकर एक संरचित सामाजिक निवेश ढांचे में बदलने की कोशिश है।
पारदर्शिता, निगरानी और जोखिम नियंत्रण
नए नियमों में पारदर्शिता को सबसे अहम स्थान दिया गया है। यदि किसी ZCZP इंस्ट्रूमेंट की लिस्टिंग समाप्त हो जाती है, तो बची हुई राशि को कंपनियां अधिनियम, 2013 के तहत निर्धारित सरकारी फंड में जमा करना अनिवार्य होगा। साथ ही इसकी रिपोर्ट भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) को देनी होगी।
इसके अलावा, NPO को नियमित रूप से प्रभाव रिपोर्ट (Impact Report) जमा करनी होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि फंड का वास्तविक उपयोग और उसका सामाजिक प्रभाव क्या रहा।
SEBI ने इस प्रणाली को और व्यवहारिक बनाने के लिए न्यूनतम सब्सक्रिप्शन सीमा को 75 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया है, जिससे छोटे सामाजिक प्रोजेक्ट्स के लिए फंड जुटाना आसान हो गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम जोखिम और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है, ताकि CSR फंड का दुरुपयोग रोका जा सके।
बढ़ता CSR खर्च और भविष्य की संभावनाएं
भारत में CSR खर्च पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है। वित्त वर्ष 2024-25 में सूचीबद्ध कंपनियों का CSR खर्च 23 प्रतिशत बढ़कर लगभग ₹22,212 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि कुल CSR व्यय करीब ₹35,000 करोड़ के आसपास रहा।
पिछले 10 वर्षों में कुल CSR खर्च ₹1.22 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है, जो दिखाता है कि कॉरपोरेट सेक्टर सामाजिक विकास में लगातार अधिक भागीदारी कर रहा है।
वर्तमान में सोशल स्टॉक एक्सचेंज पर 120 से अधिक NPO पंजीकृत हैं, लेकिन केवल कुछ ही संस्थाएं सक्रिय रूप से फंड जुटा रही हैं। नए नियमों के बाद इस संख्या में तेजी से वृद्धि की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यवस्था आने वाले समय में CSR को अधिक प्रभावी बनाएगी और शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मजबूत करेगी।
CSR से सामाजिक निवेश तक का बदलाव
नए नियमों को केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। CSR अब केवल अनिवार्य खर्च नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा सामाजिक निवेश मॉडल बन रहा है, जिसमें पारदर्शिता, मापनीय प्रभाव और बाजार आधारित भागीदारी तीनों शामिल हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव भारत में कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी को एक नई पहचान दे सकता है, जहां कंपनियां केवल दानदाता नहीं बल्कि सामाजिक विकास की सक्रिय भागीदार बनेंगी।