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बढ़ते वैश्विक कर्ज और महंगी उधारी के दौर में भारत के लिए कौन से सुधार अहम?

केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार-भारत के बॉन्ड बाजार को मजबूत करने की चुनौती। सेकेंडरी मार्केट गतिविधियां बढ़ाने और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने पर जोर।

By डॉ. अभिज्ञात

May 28, 2026 17:42 IST

नई दिल्लीः भारत को अपने बॉन्ड बाजार को मजबूत और वैश्विक स्तर के अनुरूप बनाने के लिए निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने, सेकेंडरी मार्केट को अधिक सक्रिय करने और कॉरपोरेट व सब-सॉवरेन कर्ज बाजार को गहराई देने की जरूरत है। केयरएज रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के अनुसार विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़े स्तर पर दीर्घकालिक पूंजी जुटाने वाला सक्षम डेट मार्केट बेहद महत्वपूर्ण होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत का बॉन्ड बाजार अभी भी मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों पर आधारित है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सरकारी ऋण प्रतिभूतियों की हिस्सेदारी 55.4 प्रतिशत है। यह स्तर फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे कुछ एशियाई देशों के बराबर माना जा सकता है लेकिन जापान, अमेरिका और ब्रिटेन जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत अभी काफी पीछे है।

केयरएज रेटिंग्स ने कहा कि हाल के वर्षों में कई नीतिगत और संस्थागत सुधारों से सरकारी प्रतिभूति बाजार मजबूत हुआ है। सक्रिय ऋण प्रबंधन, वैश्विक बाजार से बढ़ता जुड़ाव, कम रोलओवर जोखिम और विविध परिपक्वता प्रोफाइल जैसी वजहों से इसमें स्थिरता आई है। साथ ही बीमा कंपनियों, भविष्य निधि और पेंशन फंड जैसे दीर्घकालिक संस्थागत निवेशकों की भागीदारी भी बढ़ रही है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि खुदरा और विदेशी निवेशकों की भागीदारी अभी सीमित है, जबकि सेकेंडरी मार्केट में ट्रेडिंग गतिविधियां अपेक्षाकृत कम बनी हुई हैं। इसके अलावा राज्यों और कॉरपोरेट क्षेत्र के कर्ज बाजार का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। इन कमियों को दूर करना भारत के डेट मार्केट को मजबूत करने के लिए जरूरी होगा।

रिपोर्ट में वैश्विक परिस्थितियों को भी चुनौतीपूर्ण बताया गया है। बढ़ते सरकारी कर्ज, सख्त वित्तीय परिस्थितियां, निवेशकों के बदलते व्यवहार और भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक डेट मार्केट अधिक जोखिमपूर्ण दौर में प्रवेश कर रहा है। बेहद कम ब्याज दरों और आसान तरलता वाले दौर के समाप्त होने के बाद अब दुनिया में उधारी की लागत बढ़ रही है, जिसका असर वैश्विक ऋण व्यवस्था पर पड़ेगा। इसके बावजूद मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति, भरोसेमंद नीतिगत ढांचा, नियंत्रित कॉरपोरेट कर्ज और वैश्विक बाजार से बढ़ते जुड़ाव की वजह से भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

रिपोर्ट के अनुसार आने वाले समय में सुधारों का फोकस बाजार में तरलता बढ़ाने, निवेशकों और जारीकर्ताओं की संख्या का विस्तार करने, सेकेंडरी मार्केट को मजबूत बनाने और वित्तीय नवाचार को प्रोत्साहन देने पर होना चाहिए। इससे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति मिलेगी और डेट मार्केट अधिक प्रभावी बन सकेगा।

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