पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थिति के फिर से बिगड़ने के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में फिर से उछाल आया है। ईरान के बंदरगाह अब्बास में सेना के ठिकाने पर अमेरिकी सेना ने हमला किया था। इसके बाद ही कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में करीब 4% की वृद्धि दर्ज की गयी है।
गुरुवार (28 मई) को ब्रेंट क्रुड के प्रति बैरल की कीम 3.75 प्रतिशत बढ़कर 97.83 डॉलर हो गयी है। वहीं वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट क्रुड ऑयल की कीमत प्रति बैरल 4 प्रतिशत बढ़ गयी है। इसकी कीमत अब 92.22 डॉलर हो गयी है।
ईरान और अमेरिका के बीच फरवरी के अंत से शुरू हुए युद्ध की वजह से पिछले लंबे समय होर्मूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद था। इस रास्ते से होकर ही दुनिया की लगभग एक-पांचवां हिस्सा ईंधन आपूर्ति होता है।
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इसकी वजह से पिछले कई महीनों से कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ी हुई हैं। हाल ही में तेहरान और वॉशिंगटन युद्धविराम पर सहमत हुए हैं और शांति समझौते को लेकर बातचीत कर रहे हैं।
संभावना जतायी जा रही थी कि इसी सप्ताह यह शांति समझौता सफल भी हो जाएगा। इसकी वजह से तेल की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गयी थी। पिछले सत्र में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 5 प्रतिशत गिरकर इस महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी।
होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने को लेकर उम्मीद बढ़ी थी। लेकिन इसी बीच अमेरिका के हमले के बाद एक बार फिर तनाव बढ़ने की आशंका बढ़ गयी है। जानकारों का मानना है कि इसी वजह से तेल की कीमतों में फिर बढ़ोतरी देखी जा रही है।
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा दिया है। पिछले कुछ महीनों में रुपये की कीमत में भी काफी गिरावट आई है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होने के कारण भारत की सरकारी तेल रिफाइनिंग कंपनियों का घाटा भी बेहद बढ़ गया है।
इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले कुछ दिनों में चार चरणों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाई हैं। हालांकि जानकारों का मानना है कि जिस रफ्तार से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, उसकी तुलना में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अपेक्षाकृत बहुत कम वृद्धि ही हुई है।