नई दिल्ली : भारत में दवाइयों की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। केंद्रीय औषधि नियंत्रक संगठन (सीडीएससीओ) की हालिया चेतावनी ने स्वास्थ्य जगत में हलचल पैदा कर दी है। अप्रैल माह की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट के आधार पर कुल 78 बैच दवाइयों, चिकित्सा सामग्रियों और कॉस्मेटिक्स को “नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी” (एनएसक्यू), नकली, मिलावटी या भ्रामक लेबलिंग वाले उत्पादों के रूप में चिन्हित किया गया है।
इससे पहले इसी महीने केंद्रीय प्रयोगशाला की एक अलग रिपोर्ट में 42 और दवा बैचों को एनएसक्यू घोषित किया गया था। इस तरह अप्रैल महीने में कुल 120 नमूने गुणवत्ता परीक्षण में विफल पाए गए हैं। यह आंकड़ा देश में दवा गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
नियमित निगरानी प्रक्रिया के तहत दवाओं के नमूने देशभर के केंद्र और राज्य स्तर की प्रयोगशालाओं में जांच के लिए भेजे जाते हैं। इन परीक्षणों में कहीं दवा के घुलने की प्रक्रिया में कमी पाई गई, तो कहीं सक्रिय रासायनिक तत्वों की मात्रा निर्धारित मानकों से मेल नहीं खाई। कुछ मामलों में तो दवा में सक्रिय घटक लगभग शून्य स्तर पर पाए गए।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कुछ नमूनों में नसबंदी (स्टेरिलिटी) मानक, सूक्ष्मजीव गुणवत्ता (माइक्रोबायोलॉजिकल क्वालिटी) और लेबलिंग से जुड़ी गंभीर त्रुटियाँ पाई गई हैं। कई ऐसी दवाएं भी इस सूची में शामिल हैं, जो सामान्य रूप से उच्च रक्तचाप, गैस-एसिडिटी, संक्रमण और मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। इससे पहले की रिपोर्ट में पेरासिटामोल और मेटफॉर्मिन जैसी आम दवाएं भी गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाई गई थीं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी दवा का एनएसक्यू घोषित होना यह संकेत नहीं देता कि वह जहरीली या जानलेवा है। इसका अर्थ केवल इतना है कि संबंधित बैच तय मानकों पर खरा नहीं उतरा जिससे उसकी प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है और मरीज को अपेक्षित चिकित्सीय लाभ न मिल सके।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि दीर्घकालिक बीमारियों और आपातकालीन उपचार के मामलों में इस तरह की गुणवत्ता खामियां अत्यंत गंभीर मानी जाती हैं। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि जहां एक ओर निगरानी प्रणाली सक्रिय है, वहीं दूसरी ओर दवा निर्माण और वितरण व्यवस्था में और अधिक सख्त गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता है।