भारत के अलग-अलग हिस्सों में लोककथाएं, रहस्य और रोमांच से जुड़ी अनेक कहानियां बिखरी हुई हैं। ऐसी ही लोकविश्वास और दंतकथाओं पर आधारित एक जगह है त्रिपुरा का उनाकोटी। सबसे पहले मन में सवाल उठता है कि इस स्थान का नाम इतना अलग क्यों है? दरअसल, इसके नाम के पीछे भी एक रोचक कथा छिपी हुई है।
अगरतला से लगभग 178 किलोमीटर दूर स्थित यह इलाका पहाड़ों और हरियाली से घिरा हुआ है। इसे लॉस्ट हिल ऑफ फेसेज़ भी कहा जाता है। इसकी वजह है यहां पहाड़ों पर उकेरी गई अनगिनत देवी-देवताओं की विशाल आकृतियां और चेहरे। इनमें भगवान शिव की लगभग 30 फुट ऊंची मुखाकृति सबसे अधिक आकर्षित करती है। इन शिल्पों के केंद्र में भगवान शिव हैं, जिन्हें स्थानीय लोग उनाकोटीश्वर काल भैरव के नाम से जानते हैं।
शिव की एक ओर सिंह पर विराजमान मां दुर्गा की प्रतिमा दिखाई देती है, जबकि दूसरी ओर मां गंगा की आकृति उकेरी गई है। इसके अलावा विशालकाय गणेश प्रतिमाएं भी यहां विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। कहीं एक बड़े पत्थर को तराशकर किसी एक देवता की मूर्ति बनाई गई है तो कहीं एक ही पहाड़ी पर अनेक देवी-देवताओं की आकृतियां साथ दिखाई देती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन अद्भुत शिल्पों को आखिर किसने बनाया? इतिहासकारों का मानना है कि ये मूर्तियां सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच बनाई गई थीं लेकिन इन्हें बनाने वाले के बारे में अब तक स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव काशी जा रहे थे। उनके साथ 99,99,999 देवता भी थे यानी एक करोड़ से एक कम। यात्रा के दौरान वे त्रिपुरा के इसी पर्वतीय क्षेत्र में विश्राम के लिए रुके। तय हुआ था कि सभी देवता रात बिताकर सूर्योदय से पहले फिर यात्रा शुरू करेंगे, लेकिन सुबह भगवान शिव के अलावा किसी भी देवता की नींद नहीं खुली। कथा के अनुसार इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने उन सभी देवताओं को पत्थर में बदल दिया और उन्हीं की आकृतियां आज भी इन पहाड़ों पर उकेरी हुई दिखाई देती हैं।
स्थानीय लोककथा एक दूसरी कहानी भी सुनाती है। कहा जाता है कि कल्लू गुर्जर नाम के एक शिल्पकार ने इन मूर्तियों को तराशा था। वह भगवान शिव का अत्यंत भक्त था। लोककथा के अनुसार कल्लू ने एक बार शिव-पार्वती के साथ कैलाश पर्वत जाने की इच्छा जताई। तब भगवान शिव ने शर्त रखी कि यदि वह एक रात में एक करोड़ देवताओं की मूर्तियां बना देगा तभी उसे अपने साथ कैलाश ले जाएंगे।
कहा जाता है कि सुबह होने से पहले कल्लू 99,99,999 देवताओं की मूर्तियां तो बना सका, लेकिन एक मूर्ति अधूरी रह गई। इसी कारण शिव-पार्वती उसे वहीं छोड़कर आगे बढ़ गए। मान्यता है कि उसी एक करोड़ से एक कम यानी उानकोटी मूर्तियों के कारण इस स्थान का नाम उनाकोटी पड़ा।
प्राचीन साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कभी यह स्थान शिवभक्तों का एक प्रमुख तीर्थ हुआ करता था। समय के साथ इसकी प्रसिद्धि कम होती चली गई और पहाड़ों पर उकेरी गई इन मूर्तियों की ओर लोगों का ध्यान भी घटने लगा। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसके संरक्षण की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2022 में यूनेस्को द्वारा इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किए जाने के बाद उनाकोटी को नई पहचान मिली। हाल ही में केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र के विकास के लिए 12 करोड़ रुपये भी मंजूर किए हैं।
हर साल अप्रैल में यहां अशोकाष्टमी मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। जनवरी महीने से ही यहां छोटे-छोटे धार्मिक उत्सव और मेलों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
हालांकि घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच मौजूद पत्थरों पर उकेरी गई ये विशाल मूर्तियां आज भी एक अनसुलझे रहस्य की तरह लोगों को आकर्षित करती हैं।