आप मुस्कुराते हुए अपनी सीट पर बैठे हैं। सामने सीट बेल्ट बांधे एयर होस्टेस भी अपनी सीट पर हैं। तभी पायलट की घोषणा गूंजती है-“हम टेक-ऑफ के लिए तैयार हैं। टेल विंड के साथ हम चार घंटे में दुबई पहुंच जाएंगे...”
कोलकाता के रनवे से एमिरेट्स की फ्लाइट सरसराते हुए उड़ान भरती है। आप सीट पर आराम से टिक जाते हैं। परिवार के साथ यूरोप घूमने जा रहे हैं-दुबई होते हुए। मन पूरी तरह से खुश।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के पीछे कितनी गणना और खींचतान होती है? आप जो दुबई पहुंच पाए, वह सिर्फ इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारत और यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) के बीच एक द्विपक्षीय समझौता है। विमानन की भाषा में इसे एयर सर्विस एग्रीमेंट कहा जाता है।
2022 के आंकड़ों के मुताबिक भारत के साथ 116 देशों के ऐसे द्विपक्षीय समझौते हैं। इन्हीं समझौतों के तहत जैसे एमिरेट्स या फ्लाई दुबई भारत आती हैं, वैसे ही भारत की एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट दुबई उड़ान भरती हैं। हालांकि कोलकाता से किसी भी भारतीय एयरलाइन की दुबई के लिए सीधी उड़ान नहीं है।
सीटों के आधार पर समझौते
इन समझौतों के भी अलग-अलग स्वरूप होते हैं। एक प्रकार का समझौता सीटों की संख्या के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए वर्तमान में भारत और यूएई के बीच हुए समझौते के अनुसार दोनों देश प्रति सप्ताह अधिकतम 63-63 हजार सीटों का उपयोग कर सकते हैं।
मान लीजिए एमिरेट्स के एक विमान में 200 सीटें हैं। दुबई से कोलकाता आकर फिर दुबई लौटने पर 400 सीटें उपयोग हो गईं। एमिरेट्स और फ्लाई दुबई दुबई से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद समेत भारत के 15 शहरों के लिए नियमित उड़ानें संचालित कर रही हैं। अलग-अलग शहरों में अलग-अलग क्षमता वाले विमान लगाए जाते हैं लेकिन कुल मिलाकर दुबई प्रति सप्ताह 63 हजार सीटों का उपयोग कर सकता है-चाहे सभी सीटें भरी हों या नहीं।
इसी तरह भारत की एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट जैसी एयरलाइंस भी प्रति सप्ताह 63 हजार सीटों का इस्तेमाल कर सकती हैं। भारतीय विमानन मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, “सिंगापुर के साथ भी प्रति सप्ताह 28 हजार सीटों का समझौता है। दोनों देश उतनी ही सीटों का उपयोग करते हैं। समस्या दुबई को लेकर है।”
दुबई को लेकर विवाद क्यों?
बताया गया कि दुबई की एयरलाइंस अभी पूरी 63 हजार साप्ताहिक सीटों का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि भारतीय एयरलाइंस की संयुक्त सीट क्षमता उसके आसपास भी नहीं पहुंचती। अधिकारी के अनुसार, “कोलकाता से किसी भारतीय एयरलाइन की दुबई के लिए उड़ान नहीं है। दिल्ली और मुंबई से जरूर हैं। अगर कोई सिर्फ मुंबई-दुबई-मुंबई यात्रा करता है तो इंडिगो की फ्लाइट का अर्थ बनता है। लेकिन भारत से कितने लोग सिर्फ दुबई के लिए यात्रा करते हैं? एमिरेट्स यूरोप और अमेरिका के कनेक्शन में हमसे बहुत आगे है।”
फिलहाल कोलकाता से यूरोप या अमेरिका के लिए कोई सीधी उड़ान नहीं है। अधिकांश यात्री एमिरेट्स का सहारा लेते हैं। इसके अलावा दोहा होकर कतर एयरवेज और अबूधाबी होकर इतिहाद की उड़ानें भी उपलब्ध हैं, जिनकी मांग काफी अधिक है। इसी कारण यूएई सरकार साप्ताहिक सीटों की संख्या 63 हजार से बढ़ाकर एक लाख से अधिक करना चाहती है।
भारतीय अधिकारी का कहना है, “लेकिन हम अभी बहुत पीछे हैं। भारत सरकार इस पर सहमत नहीं है। अगर सीटें बढ़ा दी गईं तो एमिरेट्स पूरा कारोबार ले जाएगी। हमारी एयरलाइंस की यूरोप-अमेरिका की उड़ानें खाली जाएंगी या उनकी ग्रोथ रुक जाएगी।”
अन्य देशों के साथ अलग तरह के समझौते
कुछ देशों के साथ साप्ताहिक उड़ानों की संख्या के आधार पर समझौते होते हैं। उदाहरण के लिए, लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट से जितनी उड़ानें भारत आएंगी, उतनी ही उड़ानें भारतीय एयरलाइंस हीथ्रो के लिए संचालित कर सकती हैं। तुर्की और इटली के साथ भी इसी तरह के समझौते हैं।
ओपन-स्काई पॉलिसी क्या है?
कुछ देशों के साथ ओपन-स्काई पॉलिसी लागू है। जो देश भारत से 5,000 नॉटिकल माइल या करीब 9,000 किलोमीटर दूर हैं, उनके साथ सीट या उड़ानों की संख्या की कोई सीमा नहीं है। अमेरिका इसका उदाहरण है। भारतीय एयरलाइंस जितनी चाहें उतनी उड़ानें अमेरिका के लिए चला सकती हैं और अमेरिकी एयरलाइंस भी भारत के लिए। इन समझौतों में यात्री विमानों के साथ-साथ कार्गो यानी मालवाहक उड़ानों का भी उल्लेख होता है।
वियना को हब बनाने का नया समझौता
हाल ही में एक नया प्रकार का समझौता सामने आया है। ऑस्ट्रिया के साथ हुए समझौते के तहत भारतीय एयरलाइंस उस देश की राजधानी वियना को हब के रूप में इस्तेमाल कर सकती हैं। एयर इंडिया इसका उपयोग कर रही है।
आमतौर पर एयर इंडिया की दिल्ली से टोरंटो उड़ान का रूट दिल्ली–टोरंटो–दिल्ली होता है और बीच में किसी अन्य देश में लैंडिंग नहीं हो सकती। लेकिन वियना को हब बनाए जाने के बाद अब एयर इंडिया दिल्ली से टोरंटो जाते समय वियना में रुक सकती है—और वह ऐसा कर भी रही है। इससे लंबी उड़ान की थकान कम होती है, बीच में री-फ्यूलिंग संभव होती है और अतिरिक्त यात्रियों को भी जोड़ा जा सकता है।