“मैं एक रियलिटी हूँ।”
प्रसंग भले ही निजी हो, लेकिन महाश्वेता देवी की यह आत्मकथा सरीखी घोषणा हमारी समस्त मुक्तचेतना के लिए शिरोधार्य है। फिर भी उन्हें खोजते-खोजते हम उनके अंतिम गंतव्य तक पहुँच ही नहीं पाए। किसी तरह उनके बाहरी रूप को देखने का दिखावा भर कर पाए और उसी में हम हाँफते रह गए। इस चौखट को पार करके हम महाश्वेता के अंतरंग दरवाज़े–खिड़कियाँ खोल नहीं सके। यदि खोल पाते तो देखते तीर, धनुष और मादल-धामसा के भीतर सदैव विराजमान एक चिरकालिक चंदनवन!
यदि कभी हम उस निर्जन कक्ष में प्रवेश कर सकें तो अनुभव कर पाएँगे कि बाहर और भीतर की महाश्वेता एक ही हैं, अभिन्न। समझ पाएँगे कि उनकी वज्रनिनाद जैसी क्रुद्ध गद्य भाषा में कितनी ममता छिपी है! समाज के वर्ग-शत्रुओं के विरुद्ध समझौता न करने वाले उस क्रोध को इतने अनुराग के साथ और किसने लिखा है? मनुष्य से मनुष्य के बीच अंतहीन प्रेम का संवाद इतनी कठोर ध्वनि में और कौन लिख सका है! वह कर पाईं क्योंकि घर की वही साधारण सी लगती महाश्वेता पूरी तरह विकसित हुईं और तभी वे सार्वजनीन हुईं। उनकी कलम कम्यून बन गई। यही है “रियलिटी”! महाश्वेता ने इसे स्वीकार किया। वे अपने आप से ज़रा-सा भी नहीं हटीं। तनिक भी डगमगाईं नहीं। तभी तो पहाड़ मोहम्मद के पास आ गए! महाश्वेता की कलम में रोमांस, रेवोल्यूशन, प्रतिवाद और विद्रोह फूट पड़े। मनुष्य का उत्थान–पतन, अवमानना–उपेक्षा, सम्मान–प्रेम सब कुछ महाश्वेता के मानचित्र पर लोट-पोट करता रहा।
घर और बाहर जब दोनों एक हो जाते हैं तो यही स्वाभाविक है। इसी कारण इतिहास इतना अनिवार्य बनता है। महाश्वेता स्वयं कहती थीं- “साहित्य को केवल भाषा, शैली और शिल्प के आधार पर परखने का मानदंड गलत है। साहित्य का मूल्यांकन इतिहास के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। लेखक के लिखने के समय और इतिहास की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखे बिना किसी लेखक का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। मैं पुराकथाओं, पौराणिक पात्रों और घटनाओं को वर्तमान के संदर्भ में वापस लाकर इस्तेमाल करती हूँ, यह बताने के लिए कि अतीत और वर्तमान वास्तव में लोकजीवन में एक अविच्छिन्न धारा के रूप में जुड़े हुए हैं।”
इस निर्विकल्प, निकटवर्ती महाश्वेता को हम काफ़ी हद तक जानते हैं। लेकिन उनके उस निर्विकार, निर्मोह अतीत को उतना नहीं जानते। हम समझ ही नहीं पाते कि उनकी फूलों की पंखुड़ियों में इतनी आँखों की नमी क्यों है। क्यों उनके तीर-धनुष में ऐसा आनंद-भैरवी छिपी हुई है।
महाश्वेता लगातार शांत भी रहीं और सहज ही अशांत भी हो उठीं। वे जानबूझकर पहचाने रास्तों पर चलते हुए अपना पता खो देती थीं। वे परिचित नक्शे खोलकर अनजानी सीमाएँ तलाशती थीं। उन्होंने जितना संजोया, उतना ही लुटाया भी। क्यों? कैसे? महाश्वेता यह सब कैसे कर पाईं? उनकी इस कीर्तिनाशा सी कीर्ति का रहस्य क्या है?
ज़रा बायोस्कोप की नली में आँख रखकर एक फ्लैशबैक देखें। वे एक शिक्षित, संभ्रांत, कलामय परिवार में बड़ी हुईं। उन्होंने अच्छे अंकों के साथ पढ़ाई पूरी की। नौकरी की, आंदोलनों में शामिल हुईं, नाटक किए। बहुत कम उम्र में उन्होंने गृहस्थी बसाई। फिर उसी गृहस्थी को उन्होंने स्वयं तोड़ दिया। तीस के मध्य उम्र में पति विजन भट्टाचार्य और चौदह वर्ष के बेटे नवारुण को छोड़कर “अभी बहुत काम बाकी है” कहकर महाश्वेता घर से निकल आईं। वे अकेली होना चाहती थीं। लेकिन हो नहीं सकीं। किसी ने कहा है-“It’s so painful to be lonely in a crowded city.”
असित गुप्ता से विवाह कर महाश्वेता ने फिर से घर बसाया। और वही महाश्वेता शहर के जन-अरण्य को छोड़कर दौड़ पड़ीं जंगलों की उस हाहाकार-भरी शून्यता की ओर, जहाँ मनुष्य की बस्तियाँ अकाल की तरह सूनी पड़ी थीं।
अकेली होने निकली महाश्वेता करोड़ों लोगों में घुलती चली गईं। जितना वे घुलीं, उतना ही उन्होंने मनुष्य की कथा लिखी-संभव-असंभव को मिलाकर। यथार्थ और कल्पना को एक साथ पिरोकर। इतना सब होने के बाद भी महाश्वेता का अफ़सोस, उनका पछतावा कम नहीं हुआ। बार-बार उन्हें विजन और नवारुण के उस छोटे-से परिवार की याद आती रही। अपने ही बच्चे से धीरे-धीरे दूर होते जाने की पीड़ा ने महाश्वेता को भीतर से क्षत-विक्षत कर दिया। लेकिन वे लौट नहीं सकीं। विजन ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नवारुण ने भी नहीं पूछा- “क्यों देखती रहती हो माँ, मेरे चेहरे की ओर?”
बेटा कविताएँ लिखने लगा। माँ ने चुपचाप उन सारी कविताओं को कंठस्थ कर लिया। बेटे को इसका पता तक नहीं चला। मन-ही-मन माँ ने कितनी बार बेटे को उसके घरेलू नाम से पुकारा-“बाप्पा।” बेटा सुन नहीं पाया। उत्तर नहीं दे पाया। माँ लगातार बेटे को चिट्ठियाँ लिखती रहीं। लेकिन बेटा निरुत्तर ही रहा।
‘लाल संवाद’ पत्रिका में प्रकाशित राहुल दासगुप्ता द्वारा लिए गए एक साक्षात्कार में महाश्वेता ने स्वयं यह सब कहा है। उन्होंने कहा-विजन और नवारुण के लिए “आमी एकटा रियलिटी”।
हाँ, यही तो है। अनुनय-विनय, शिकायत-आरोप, अभिमान-अनुराग ये सब ही तो रियलिटी हैं। प्रेम का उलटा पक्ष हमेशा घृणा ही हो, ऐसा नहीं है। प्रेम और उपेक्षा सदा परस्पर विरोधी नहीं होते। सम्मान का दूसरा सिरा अपमान ही हो, यह भी आवश्यक नहीं है। इनके भीतर, इनके बाहर और इनके बीच में भी कुछ और होता है। जीवन की कुछ मुक्त, उन्मुक्त, मुग्ध सीमाओं पर स्वतंत्रता और स्वेच्छाचार हाथों में हाथ डाले खड़े रहते हैं। समझौता और ज़िद दोनों ही सत्य हैं, दोनों ही सहज और स्वाभाविक।
महाश्वेता के मर्म और कर्म दोनों में ही यह सब कुछ एक स्वाभाविक रियलिटी के रूप में मौजूद है। वे जिन-जिन लोगों से मिलीं, वे अप्रत्याशित थे। हर घटना अविश्वसनीय दुर्घटना-सी। महाश्वेता के परिचित लोग अपने ढंग से जीने के लिए भिखारी बनना चाहते हैं। बसने के लिए श्मशान उपहार में माँगते हैं। कोई दृष्टिहीन पेड़ की डाल पर बैठी चिड़िया को देख लेता है। कोई विकलांग छलाँग लगाकर उसी चिड़िया को पकड़ लेता है। कोई वस्त्रहीन व्यक्ति उस चिड़िया को जेब में रख लेता है। और कोई मूक-बधिर उसे देखे बिना ही आनंद से उछल पड़ता है।
आश्चर्यजनक-लेकिन रियलिटी।
वास्तविक जीवन में महाश्वेता ने बहुत कष्ट सहा। इसीलिए वे प्रेम कर सकीं, यह जानते हुए भी कि वह अवास्तविक है। उन्होंने प्रेम किया इसीलिए उन्हें इतना दुःख भी झेलना पड़ा। इस महाश्वेता को जाने बिना यह समझा ही नहीं जा सकता कि किस प्रकार 'मधुरे मधुर' से 'तिमिर लगन’, 'एतटुकु आशा' से 'तारार अंधार’, 'बायस्कोपेर बाक्स' से 'आंधारमानिक’, ' विपन्न आयना' से 'धानेर शीषे शिशिर’, ‘6 डिसेम्बरेर पर' से 'उनत्रिश नम्बर धारार आसामी’, 'हाजार चुराशिर मा' से 'अरण्येर अधिकार' जैसी रचनाएँ रची गईं।
मनुष्य महाश्वेता को समझे बिना यह भी नहीं समझा जा सकता कि किस प्रकार 'मूर्ति' से 'नीड़ेते मेघ’, 'बेहुला' से 'द्रौपदी’, 'स्तन्यदायिनी' से 'रुदाली’, 'गिरिबाला' से 'हरिराम महातो’, 'बान' से 'चिन्ता’, 'रांग नम्बर' से 'बायेन’, 'बिछन' से 'शिकार’, 'अग्निगर्भ' से 'मौल अधिकार ओ भिखारी दुसाद' जैसी कृतियाँ निर्मित हुईं।
यहाँ लीला मजूमदार का विश्लेषण प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने कहा था- “महाश्वेता से बात करते हुए ऐसा लगता है कि उसका जीवन दुःख की ईंटों से बना हुआ है। इसी कारण वह देश के नाना प्रकार के दुःखी लोगों की मर्मवेदना को इतने गहरे रूप में समझ सकी और उनके जीवन-चित्र इस तरह रच सकी।”
जो भी मनुष्य महाश्वेता के जीवन की ओर देखता है, उसे यही महसूस होता है कि उसी निजी जीवन-यापन से उन्होंने स्वयं को तैयार किया। उनके ही शब्दों में-“मैं कच्चे माल की तलाश में और कहीं क्यों जाऊँ? मैंने तो अपने ढंग से ही सब मनुष्यों को जाना और समझा है। मेरी सारी रचनाएँ मैंने और उन्होंने हम सबने मिलकर लिखी हैं।”
इसके अलावा, अपने अत्यंत घनिष्ठ लोगों के बीच, एकांत में महाश्वेता बार-बार नवारुण के लिए विलाप करती थीं। आहें भरतीं और कराहती थीं। कहती थीं-“सब लोग यही देखेंगे कि मैंने पति और बच्चे को छोड़ दिया, लेकिन कोई यह याद नहीं रखेगा कि उनसे दूर होकर मैं कितनी लहूलुहान हुई।”
और फिर वही विषण्ण महाश्वेता, जब उन्होंने नवारुण की वह कविता पढ़ी-
"कब एक शब्द की चिनगारी
उड़कर सूखी घास पर गिरेगी?
सारा शहर उलट-पलट हो जाएगा,
भयानक क्रोध में युद्ध छिड़ जाएगा।
ठुड्डियाँ फटेंगी, छातियाँ जलेंगी,
एक नदी उफनकर उठेगी,
और बस एक ही चेहरे की
खोज में भटकती रहेगी।”
नवारुण किसे खोज रहे थे?
माँ के श्रीचरणों को?
महाश्वेता ने महानंद के साथ जीवन भर इस पर विश्वास किया। आमरण उन्होंने इस कविता को सहेज कर रखा। माँ की सैकड़ों-हज़ारों अनुत्तरित चिट्ठियों के बदले बेटे की यह पंक्ति-
“मागो, तोमार चरण दु’टी बोक्खे आमार धोरी”।
इसी तरह महाश्वेता का जीवन आँसुओं में, आनंद में, स्नेह में और आग की ताप से झुलसकर नष्ट होता चला गया। फिर उसी आधी-जली पांडुलिपि पर टप-टप गिरती रही व्याकुल कलम की जलधारा। महाश्वेता के साहित्य में मनुष्यों की कोलाहल-भीड़ के भीतर एक सूक्ष्म, अविरल हाहाकार बहता रहा। मनुष्य के संघर्ष में डूबकर पसीना, रक्त और प्रेम एक साथ फूटते रहे।
यही हैं महाश्वेता।
यही है महाश्वेता की रियलिटी।
हर रचना लिखने से पहले वे मन-ही-मन “माँ” की पुकार सुनना चाहती थीं। लेकिन कभी खुलकर वह नहीं कहा। बहुत-सी कही गई बातों की भीड़ में वे अनकही बातें खो गईं और आज भी महाश्वेता की आँखों में ठहरी हुई हैं।
“सुबह-शाम” मां, मृत्यु से ठीक पहले “माँ” पुकारने की अनुमति दी थी साधन को। उसके बाद अनादि डॉक्टर ने देखा- “जटी ठाकुरानी की आँखों में केवल आश्चर्य, एक अतिंद्रिय दृष्टि…आसन्न मृत्यु के अलावा कोई और चीज़ इतनी सुंदरता से मनुष्य की आँखों को विस्मित नहीं कर सकती।”