नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग द्वारा कराए गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को संवैधानिक और वैध ठहराते हुए इस पर उठाए गए सवालों को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इसलिए इस प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता कि यह सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया से अलग है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले में याचिकाकर्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि अदालत ने निर्वाचन आयोग और SIR प्रक्रिया का समर्थन करने वाले पक्षों की दलीलों को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की ओर से दायर 20 से अधिक जनहित याचिकाओं में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे और पुनरीक्षण की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी, लेकिन अदालत ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया।
अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि अदालत ने माना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए यह जरूरी है कि मतदाता सूची में किसी भी अयोग्य व्यक्ति का नाम शामिल न हो। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग द्वारा मान्य 11 दस्तावेजों की सूची पूरी तरह वैध है और इन्हें पहचान व पात्रता के आधार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
आधार कार्ड को लेकर भी अदालत ने टिप्पणी की। उपाध्याय के अनुसार कोर्ट ने कहा कि पहले इसे बारहवें मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाना उचित था, लेकिन आगे इस संबंध में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, इसका निर्णय निर्वाचन आयोग करेगा।
सुप्रीम कोर्ट के पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल थे। उन्होंने कहा कि बिहार में शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया कानून के अनुरूप है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता को बहाल करना है। अदालत ने इस अभ्यास को वैध और संवैधानिक बताते हुए कहा कि यह चुनावी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग की भूमिका केवल मतदाता सूची में नाम शामिल करने की पात्रता तय करने तक सीमित है। आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो इससे उसकी नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती क्योंकि नागरिकता का निर्धारण केवल कानून के तहत सक्षम प्राधिकरण ही कर सकता है।