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मैसूर पैलेस, हेमा मालिनी का नृत्य और रहस्यमयी सिहरन

मैसूर पैलेस से जुड़े हैं कई रहस्य। इस महल में कई लोगों ने अजीब और सिहरन भरे अनुभव महसूस किए हैं। हेमा मालिनी का मशहूर थाली पर किया गया नृत्य भी इसी पैलेस से जुड़ा हुआ है।

राज-दरबार सजा हुआ है। सामने एक नर्तकी अपने भाव, लय और अदाओं से ऐसा जादू बिखेर रही है कि राजा, रानी, मंत्री और सेनापति तक मंत्रमुग्ध होकर उसे देख रहे हैं। महल की महिलाओं की निगाहें भी परदे के पीछे से उसी नृत्य पर टिकी हैं। उस दृश्य से नज़र हटाना मुश्किल था। हालांकि हममें से कोई भी उस राजमहल में मौजूद नहीं था, फिर भी टेलीविजन की स्क्रीन से आंखें हट नहीं रही थीं। नृत्य की हर मुद्रा, हर ताल, हर घुमाव आज भी स्मृति में उतना ही ताजा है। खासकर थाली पर संतुलन बनाकर किया गया वह नृत्य, जिसे मैं आज तक भूल नहीं पाई हूं।

मुझे बचपन से ही नृत्य से गहरा लगाव रहा है। उस समय दूरदर्शन पर छुट्टियों के दिन फिल्में दिखाई जाती थीं। वहीं पहली बार मैंने किसी भव्य महल को देखा था और उसके साथ देखा था हेमा मालिनी का मनमोहक नृत्य। थाली पर संतुलन बनाकर किए जाने वाले इस नृत्य को ‘तरंगम’ कहा जाता है, जो कुचिपुड़ी शैली का हिस्सा है। हेमा मालिनी को पहली बार मैंने इसी रूप में देखा था। अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस फिल्म की बात कर रही हूं। जी हां, वह थी शक्ति सामंत निर्देशित फिल्म ‘महबूबा’।

हेमा मालिनी मूल रूप से भरतनाट्यम की प्रशिक्षित नृत्यांगना हैं। बचपन से उन्होंने इस कला का अभ्यास किया। भरतनाट्यम के अलावा कुचिपुड़ी और मोहिनीअट्टम में भी उनकी गहरी पकड़ है। ‘महबूबा’ फिल्म में उनकी वर्षों की साधना साफ झलकती है। उसी नृत्य के माध्यम से मैंने उन्हें पहली बार पहचाना। फिल्म 1976 में रिलीज हुई थी, जबकि तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। लेकिन दूरदर्शन के दौर में पूरा परिवार एक साथ बैठकर फिल्में देखा करता था। हमारे घर में भी यही परंपरा थी। तब हर कमरे में टीवी नहीं हुआ करता था। उसी दौर में दूरदर्शन पर यह फिल्म दिखाई गई थी।

मैं तब थोड़ी बड़ी हो रही थी और नृत्य सीखना शुरू कर चुकी थी। केवल नृत्य देखने के लिए दादाजी ने मुझे ‘महबूबा’ देखने की अनुमति दी थी। यकीन मानिए, उस नृत्य का दृश्य आज भी मेरी स्मृति में बिल्कुल जीवंत है। मन्ना डे का गीत ‘गोरी तेरी पैजनिया’ और उस पर राजेश खन्ना का अभिनय, साथ में हेमा मालिनी का नृत्य...सब कुछ किसी जादुई संसार जैसा लगता था। इस फिल्म की शूटिंग मैसूर पैलेस में हुई थी, जिसे अंबा पैलेस भी कहा जाता है। कर्नाटक के मैसूर में स्थित यह वाडियार राजवंश का ऐतिहासिक महल है, जहां कई फिल्मों की शूटिंग हुई है। यहां तक कि फिल्म ‘शोले’ के प्रसिद्ध गीत ‘महबूबा ओ महबूबा’ के कुछ दृश्य भी इसी महल परिसर में फिल्माए गए थे।

बचपन में दादाजी और पिता से मैंने मैसूर पैलेस की कहानियां सुनी थीं। यह जानकर हैरानी होती थी कि इतना सुंदर राजमहल लकड़ी से बना था। मन में सवाल उठता था कि पत्थर के बिना भी क्या इतना भव्य महल बन सकता है? जब भी मैं पांवों में घुंघरू बांधकर अभ्यास करती, उस महल का नृत्य कक्ष आंखों के सामने घूम जाता। तब देश के दूसरे महलों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन मन में एक इच्छा जरूर थी-काश, मैं भी उस जगह पर नृत्य कर पाती। उसी समय से मैसूर पैलेस देखने का सपना मन में बस गया था।

कॉलेज के दिनों में आखिरकार मुझे वहां जाने का अवसर मिला। जिस जगह ने वर्षों तक मेरे मन में एक विशेष स्थान बनाए रखा था, उसे अपनी आंखों से देखना किसी सपने के सच होने जैसा था। हालांकि वहां नृत्य करने की इच्छा अधूरी ही रह गई।

भारत में कई राजमहल हैं। कुछ रोमन स्थापत्य शैली से प्रभावित हैं तो कुछ इस्लामी वास्तुकला की झलक दिखाते हैं। इतिहास बताता है कि मैसूर के राजा इसी महल में रहते थे और यहीं राज-दरबार सजता था, बिल्कुल वैसे ही जैसे ‘महबूबा’ फिल्म में दिखाया गया था। महल घूमते हुए बार-बार उसी फिल्म के दृश्य याद आ रहे थे। गाइड भी बता रहे थे कि फिल्म के कौन-कौन से दृश्य महल के किन हिस्सों में शूट किए गए थे।

इतिहास के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में यदुराया वाडियार राजाओं ने इस महल का निर्माण कराया था। समय-समय पर इसका पुनर्निर्माण और विस्तार होता रहा। पुराना महल लकड़ी का बना था। 1897 में वाडियार राजवंश के महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजा वाडियार की बड़ी बहन राजकुमारी जयलक्ष्मम्मानी के विवाह समारोह के दौरान महल में भीषण आग लग गई। बताया जाता है कि विवाह समारोह में काम कर रहे एक व्यक्ति के हाथ से जलता हुआ कोयला गिर गया था, जिससे आग तेजी से फैल गई। पूरा महल तीन दिनों तक जलता रहा। बाद में महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजा वाडियार ने दोबारा महल निर्माण का कार्य शुरू कराया। 1897 में शुरू हुआ निर्माण 1912 में जाकर पूरा हुआ।

वर्तमान महल सफेद पत्थर के गुंबदों वाला तीन मंजिला भवन है। इसमें 145 फुट ऊंचा पांच मंजिला टावर भी है। महल के सात प्रवेश द्वार हैं, जिनमें पूर्व का जय मार्तंड गेट, उत्तर का जयराम-बलराम गेट और दक्षिण का वराह तथा अंबा विलास गेट प्रमुख हैं। महल के बीचोंबीच बने मेहराब के ऊपर धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी गजलक्ष्मी की मूर्ति स्थापित है। पुराने किले परिसर में तीन मंदिर हैं जबकि मुख्य महल में कुल 18 मंदिर स्थित हैं। मैसूर के राजा चामुंडी देवी के उपासक थे, इसलिए महल का मुख चामुंडी हिल्स की ओर रखा गया है।

महल में दो विशाल दरबार हॉल हैं। रविवार और सरकारी छुट्टियों को छोड़कर यहां लाइट एंड साउंड शो भी आयोजित किया जाता है, जिसे देखकर लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। एक समय यहां विभिन्न देशों के राष्ट्रगान भी बजाए जाते थे। शाम के बाद महल के बाहर इसका आयोजन होता था। अब यह परंपरा जारी है या नहीं, इसकी जानकारी मुझे नहीं है।

मैसूर पैलेस जितना भव्य है, उतनी ही रहस्यमयी कहानियां भी उससे जुड़ी हुई हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि इस महल में अतृप्त आत्माओं और अभिशापों की छाया आज भी मौजूद है। सबसे प्रसिद्ध कथा ‘तालकाड़ु के श्राप’ की है। कहा जाता है कि 1612 में विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद जब राजा वाडियार ने सत्ता संभाली, तब तत्कालीन रानी के पास बहुमूल्य आभूषण थे। राजकीय सैनिक जब उन्हें लेने पहुंचे तो रानी कावेरी नदी में कूद गईं। मरने से पहले उन्होंने श्राप दिया कि मैसूर के राजाओं को कभी सीधा उत्तराधिकारी प्राप्त नहीं होगा। आश्चर्य की बात यह है कि लगभग 400 वर्षों तक मैसूर राजपरिवार में किसी राजा की अपनी संतान उत्तराधिकारी नहीं बनी। राजवंश को आगे बढ़ाने के लिए दत्तक संतान का सहारा लिया गया।

कई लोगों का विश्वास है कि उस रानी की अतृप्त आत्मा आज भी महल में भटकती है। कुछ लोगों का दावा है कि देर रात महल के गलियारों और दरबार हॉल में पायल की आवाज सुनाई देती है। लोककथाओं के अनुसार किसी समय दरबार की एक सुंदर नर्तकी की असमय मृत्यु हो गई थी और उसकी आत्मा आज भी महल में घूमती है। रात में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक है, लेकिन कई सुरक्षाकर्मियों ने अजीब आवाजें सुनने का दावा किया है।

कुछ पर्यटक और गाइड यह भी कहते हैं कि महल के डॉल ऑडिटोरियम या पुराने हथियारों वाले हिस्से में जाने पर ऐसा महसूस होता है जैसे कोई लगातार नजर रख रहा हो। हालांकि मैंने खुद सुबह और रात के महल में जमीन-आसमान का अंतर महसूस किया। सुबह महल लोगों की भीड़ से भरा रहता है। हर कोई अनुशासन के साथ महल घूमता है। राजाओं के वस्त्र, हथियार, दुर्लभ चित्र- सब कुछ आकर्षित करता है। यहीं मैंने पहली बार ऐसा चित्र देखा था, जो जिस दिशा में जाओ, उसी तरफ देखता हुआ महसूस होता था। शायद वह घोड़े की तस्वीर थी।

लेकिन रात होते ही जब महल का मुख्य द्वार बंद हो जाता है, तब वही जगह एकदम सुनसान लगने लगती है। सुबह का चहल-पहल भरा पर्यटन स्थल रात में रहस्यमयी खामोशी में बदल जाता है। ऐसे में चाहे कोई हो या न हो, सन्नाटा इंसान के मन को घेर ही लेता है। कई बार अपने ही कदमों की आवाज सुनकर लगता है जैसे कोई पीछे-पीछे चल रहा हो।

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