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“इच्छा होती है सबके दोनों हाथ भर जाएँ... सबके रसोईघर में भात की खुशबू फैल जाए”

पारिवारिक रिश्तों के खिंचाव के साथ कहीं न कहीं एक-दूसरे का ख्याल भी जुड़ा रहता है। निम्न मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों में इसके साथ जुड़ी रहती है भात की कमी भी। लिख रहे हैं गौरव विश्वास।

‘And salted was my food, and my repose,/Salted and sobered, too, by the bird’s voice/Speaking for all who lay under the stars,/Soldiers and poor, unable to rejoice.’

- The Owl/ Edward Thomas

आज से लगभग ढाई दशक पहले भी TTP नाम की एक प्रचलित बात थी। अर्थात जैसे-तैसे पास। और उसी कारण, कहना बेहतर होगा कि जैसे-तैसे पास होने की मजबूरी में ही ये सब पढ़ना पड़ता था। कुछ दिन पहले ऑफिस से लौटते समय इस कविता की कुछ पंक्तियाँ बिखरे हुए ढंग से याद आ रही थीं। गूगल की बदौलत, पुरानी किताबों की खुशबू के बिना ही सही-सही पंक्तियाँ भी मिल गईं।

मुख्य बात यह है कि आज कोई क्रांति नहीं, बस माफी माँग रहा हूँ। माफी मांग रहा हूँ उन लोगों से (जिनमें से कई अब जीवित नहीं हैं), जिन्हें कभी मन ही मन ‘कंजूस’ या ‘क्या लालच है’ कहकर कोसता था। वे मुझसे उम्र में काफी बड़े थे। काफी संपन्न भी थे। गाँव के रिश्ते में जिन्हें मैं चाचा या दादा कहकर बुलाता था। विजयादशमी की सुबह उनके घर प्रणाम करने भी जाता था। आशीर्वाद के साथ नारियल, चीनी या तिल के लड्डू मिलते थे।

शादी, श्राद्ध, अन्नप्राशन या किसी भी समारोह में तब भी गाँव में दो तरह के निमंत्रण होते थे-अकेले या पूरे परिवार के साथ। इसमें भी एक आर्थिक-जाति-वर्ग का भेद था। सरल शब्दों में पूरे परिवार का मतलब घर के सभी लोग और अकेले का मतलब सिर्फ एक व्यक्ति। समस्या होती थी ‘अकेले’ वाले निमंत्रण में। मेरे गाँव के वही बुजुर्ग चाचा या दादा कभी-कभी अकेले ही भोज में आते थे। साथ में एक छोटा टिफिन डिब्बा लाते थे। उनकी थाली में जो भी परोसा जाता, उसका आधा वे उस डिब्बे में रख लेते थे। क्यों?

वे कुछ कहते नहीं थे। लेकिन सभी जानते थे कि वह खाना वे घर ले जाएंगे अपनी पत्नी के लिए। बेटियों की शादी हो चुकी थी। अच्छे घरों में। बेटे बाहर नौकरी करते थे। बड़े दफ्तरों में। लेकिन घर में एक और व्यक्ति थीं-पत्नी। जो शायद कह देती थीं, “तुम्हारा तो रात में निमंत्रण है। मैं अकेले के लिए क्यों झंझट करूं? थोड़ा सा मुरमुरा खाकर काम चला लूंगी।”

इसके बावजूद ‘लाज-शर्म’ छोड़कर वे टिफिन लेकर भोज में आते थे। लगभग सब जानते थे। कभी-कभी मेजबान भी कह देता- “अरे, काका को दो टुकड़े मछली देना।” तब वे भारी आवाज में कहते-“मुझे मेरा हिस्सा ही दीजिए, किसी पर एहसान करने की जरूरत नहीं।”

वह खाना वहीं थाली में ही लगभग सत्तर-तीस के अनुपात में बँट जाता। सत्तर हिस्सा धीरे-धीरे अपने तय ठिकाने की ओर चला जाता। शायद घर पहुँचकर दोनों मिलकर ठंडी हो चुकी पकौड़ी, दब चुकी मिठाई या चावल से चिपका मछली का टुकड़ा खाते थे।

यहीं आकर मेरे लिए ‘पुरुष प्रधान समाज’ या ‘घरेलू हिंसा’ की सामान्य धारणाएं उलझ जाती हैं। “संतान जन्म देते-देते जिनका बहुत समय बीत गया”, उन लोगों के बारे में भी क्या उन्होंने इस तरह सोचा था? सोचते थे? या आज भी कोई-कोई सोचता है? इस विशाल दुनिया की सारी खबर आखिर कौन रखता है!

उस समय मैं समझ नहीं पाया। इसलिए गाँव के कई लोगों की तरह मैंने भी वही सोचा। तब भी सब समीकरण नहीं समझता था। आज भी नहीं समझता हूँ। लेकिन आज खुले दिल से अपने उन गाँव के चाचाओं और दादाओं से माफी माँगता हूँ।

मुझे एक बैशाख का दिन याद आता है। बंगाली साल के पहले महीने के एक खास दिन माँ जगमोहनपुर काली मंदिर, विकलनगर काली मंदिर और ब्रह्माणी तला (जिला: मुर्शिदाबाद) पैदल जाकर पूजा करती थीं। उस बार भी ऐसा ही हुआ। उपवास करके इतना लंबा रास्ता तय करना आसान नहीं था, फिर भी जाती थीं-पति, परिवार और बच्चों की भलाई के लिए। बहुत जिद करने के बाद उस बार मुझे भी साथ ले गईं। पूजा नहीं, मेरा मकसद था मिठाई खाना।

जगमोहनपुर और ब्रह्माणी तला के बाद विकलनगर जाते समय निताई काका की मिठाई की दुकान पड़ती थी। माँ ने साड़ी के पल्लू की गाँठ खोलकर मुझे दो रुपये दिए और चार मिठाइयाँ लाने को कहा। मैंने खरीदीं और सोचा कि सब मेरी ही हैं।

माँ आगे चल रही थीं, मैं पीछे-पीछे उन मिठाइयों को खाते हुए चल रहा था। मंदिर में पूजा खत्म होने के बाद माँ ने कहा “मुझे एक दे दे, उपवास खोलूँ। बाकी तू खा लेना।” मैं चुप। सब तो खा चुका था। माँ ने समझ लिया और बोलीं-“ठीक है, घर चलकर कुछ खा लूँगी। तेरे पैर में दर्द हो रहा है ना?”

पूरे रास्ते मैं माँ से बात नहीं कर पाया। आज भी वह अपराधबोध पीछा करता है। तब से मैं वह मिठाई खा नहीं पाता। माँ से कई बार माफी माँगी। उन्होंने हँसकर कहा-“पागल!” आज फिर उनसे माफी माँगता हूँ।

आजकल माँ से फोन पर तरह-तरह की बातें होती हैं। उन्हीं में पता चलता है कि मेरे गुस्सैल पिता भी अब बदल गए हैं। कहीं निमंत्रण होता है तो माँ के लिए भी खाना ले आते हैं-जो खुद खाते हैं वही सब। आलू के चिप्स, दही-सब कुछ।

मैंने कई बार माँ से कहा था- “इतना सब सहकर इनके साथ क्यों रह रही हो? अलग क्यों नहीं हो जाती?” अब लगता है, वह भी गलत था। उसके लिए भी माफी चाहता हूँ। आय-व्यय, बचत, चावल-दाल-नमक-तेल के बाहर भी रिश्तों में बहुत सारा स्नेह चिपका होता है। उसे यूँ ही तोड़ा नहीं जा सकता।

आज लगता है, उसी स्नेह के कारण लोग लॉकडाउन में भी नियम तोड़कर बाहर निकले होंगे-घर में परिवार है, लेकिन खाने या ईंधन की कमी है। भूख सह ली जाती है, लेकिन हार मानना मुश्किल होता है। अब फिर युद्ध के कारण गैस की कमी हो रही है।

अमीर लोग जमा पैसे से लंबे समय तक चल सकते हैं। लेकिन गरीब? और मध्यमवर्ग? उनके पास न पर्याप्त बचत होती है, न राहत की लाइन में खड़े होने की सुविधा। तब वे भी चुपचाप उपवास करते हैं, मजबूरी में।

गिटार लेकर कवि कबीर सुमन गाते हैं-

‘इच्छे कोरे सबार दू-हात भोरे उठुक

“इच्छा होती है सबके दोनों हाथ भर जाएँ,

(इच्छे कोरे सबार दू-हात भोरे उठुक...)

सबके रसोईघर में भात की खुशबू फैल जाए,

फूलों से ज्यादा भात की खुशबू मन भाए,

मेरे देश, सबके देश, हर घर में...”

लेकिन इच्छा से सब कुछ नहीं होता। जो थोड़ा-बहुत होता भी है, वह दिखावे और प्रचार में खो जाता है। कैमरे के सामने खड़े शर्मिंदा, असहाय लोगों से भी मैं माफी माँगता हूँ।

यह शर्म, यह पाप मेरा है- मेरी शिक्षा का, मेरी आधुनिकता का और मेरी सभ्यता का।

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