नई दिल्ली : दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में स्वामीनाथन जे जो भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के उप-गवर्नर हैं ने कहा कि बैंकिंग को केवल आंकड़ों, मॉडल या नियमों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वित्तीय निर्णयों में अनुभव विवेक और सार्वजनिक उद्देश्य की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
उन्होंने यह विचार मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में आयोजित जी. रामचंद्रन स्मृति व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि बैंकिंग को समझने के लिए केवल संख्याएं, गणितीय मॉडल और नियामक ढांचा पर्याप्त नहीं हैं बल्कि संस्थागत व्यवहार, व्यावहारिक अनुभव और वित्त के सामाजिक उद्देश्य को भी समझना जरूरी है।
अपने बैंकिंग करियर के अनुभवों का हवाला देते हुए स्वामीनाथन जे ने बताया कि ऋण (क्रेडिट) से जुड़े निर्णय स्वभावतः अनिश्चित होते हैं और इनमें सूझबूझ की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी ऋण का निर्णय भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाता है-क्या उधार लेने वाला व्यक्ति या संस्था पैसा वापस कर पाएगी, क्या संबंधित व्यवसाय अनुमानित नकदी प्रवाह उत्पन्न कर पाएगा-ये सभी प्रश्न केवल सैद्धांतिक मॉडल से हल नहीं किए जा सकते।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बैंकिंग संस्थाएं भरोसे पर आधारित होती हैं और उनकी कई जिम्मेदारियां होती हैं जैसे जमाकर्ताओं के धन की सुरक्षा करना, ऋण तक समान पहुंच सुनिश्चित करना और व्यापक आर्थिक विकास में योगदान देना।
नियमन और पर्यवेक्षण (सुपरविजन) की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि नियामकों को केवल नियमों के पालन की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें जोखिमों की वास्तविक समझ और उनके समाधान पर भी ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार अनुपालन यह बताता है कि नियमों का पालन हुआ या नहीं जबकि पर्यवेक्षण यह देखता है कि अंतर्निहित जोखिमों को समझा और नियंत्रित किया गया है या नहीं।
उन्होंने वित्तीय स्थिरता को एक सार्वजनिक हित का विषय बताया और कहा कि इसकी असली महत्ता अक्सर संकट को रोकने में होती है न कि केवल दिखाई देने वाले परिणामों में।
स्वामीनाथन जे ने यह भी कहा कि सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ वास्तविक दुनिया का अनुभव भी जरूरी है। संस्थानों और कंपनियों को केवल उनके वित्तीय आंकड़ों के आधार पर नहीं समझा जा सकता क्योंकि ये आंकड़े हमेशा उनके जोखिम, प्रशासनिक गुणवत्ता या परिचालन वास्तविकताओं को पूरी तरह नहीं दर्शाते।
उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में हो रहे बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि यह क्षेत्र तेजी से डिजिटल और डेटा-आधारित हो रहा है लेकिन इसके मूलभूत सवाल अब भी वही हैं। उनके अनुसार इन चुनौतियों का समाधान केवल तकनीक से संभव नहीं है। इसके लिए विवेक, संस्थागत अनुशासन और यह स्वीकार करने की विनम्रता जरूरी है कि हम सब कुछ नहीं जानते।
अंत में उन्होंने कहा कि मजबूत वित्तीय प्रणाली केवल लाभ कमाने तक सीमित नहीं होती बल्कि उसमें जिम्मेदारी भी शामिल होती है। वित्तीय फैसलों का असर न केवल अर्थव्यवस्था पर बल्कि समाज पर भी पड़ता है इसलिए इन्हें व्यापक दृष्टिकोण के साथ लेना आवश्यक है।