नई दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर अब भारत की तेल कंपनियों पर साफ दिखाई दे रहा है। ICRA की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल और डीजल बेचने पर कंपनियों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि मौजूदा समय में पेट्रोल पर करीब 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 120-125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है लेकिन उपभोक्ताओं पर बोझ न बढ़ाने के लिए खुदरा कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल के तनाव के कारण तेल की कीमतों में अचानक उछाल आया है। इससे पहले कच्चा तेल 70-72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था लेकिन युद्ध की स्थिति ने बाजार का संतुलन बिगाड़ दिया है।
तेल कंपनियों पर दबाव सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। एलपीजी में भी ‘अंडर रिकवरी’ की स्थिति बन रही है क्योंकि उत्पादन और आयात लागत से कम कीमत पर गैस बेची जा रही है। अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में तेल विपणन कंपनियों का कुल नुकसान 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इसके साथ ही उर्वरक क्षेत्र पर भी असर पड़ा है। सब्सिडी का बोझ बढ़कर 2.05 लाख करोड़ रुपये से 2.25 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जो बजट अनुमान से काफी ज्यादा है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से स्थिति और जटिल हो गई है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा आयात इसी मार्ग से होते हैं। आपूर्ति में कमी के कारण ईंधन, उर्वरक और रसायनों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है जिसका असर कई उद्योगों पर पड़ा है।
उर्वरक उद्योग भी लागत बढ़ने से दबाव में है। सल्फर, अमोनिया और प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि से उत्पादन महंगा हो गया है। इस महीने उर्वरक की कीमत 19 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई, जो पहले 13 डॉलर थी। यदि सरकार सब्सिडी नहीं बढ़ाती है तो कंपनियों का मुनाफा और घट सकता है वहीं किसानों के लिए लागत बढ़ना मुश्किल पैदा कर सकता है।
रसायन और पॉलिमर उद्योग में भी इसी तरह की स्थिति है। ऊर्जा लागत बढ़ने और आपूर्ति बाधित होने से कीमतें बढ़ रही हैं। कई कंपनियां भविष्य को देखते हुए स्टॉक बढ़ाने लगी हैं हालांकि आगे मांग सामान्य होने की उम्मीद जताई जा रही है।
इसके अलावा गैस की बढ़ती कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने पाइपलाइन के जरिए गैस सप्लाई करने वाली कंपनियों पर भी अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।