नई दिल्ली : वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है क्योंकि ओपेक और ओपेक प्लस से संयुक्त अरब अमीरात के मई महीने से अलग होने के फैसले के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि इससे भारत को फायदा होगा या नुकसान।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा और तुरंत जवाब देना आसान नहीं है क्योंकि इसमें राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक कई पहलू जुड़े हैं। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अधिकतर विशेषज्ञ इसे भारत के लिए फायदेमंद मान रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार इस साल जनवरी में भारत ने अपनी कुल जरूरत का 53.2 प्रतिशत कच्चा तेल ओपेक देशों से आयात किया था लेकिन मार्च में हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण यह आयात काफी घट गया। वहीं वित्त वर्ष 2024-25 में यूएई ने भारत की कुल जरूरत का 11 प्रतिशत से अधिक तेल सप्लाई किया जो पिछले साल से करीब 1.5 प्रतिशत ज्यादा था।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति घटने के कारण भारत की रूस पर निर्भरता बढ़ी है। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर होना भारत के लिए ‘विन-विन’ स्थिति बना सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई प्रतिदिन करीब 29.20 लाख बैरल तेल उत्पादन करता है और उत्पादन बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन करने की योजना पहले से रखता था लेकिन ओपेक (मुख्य रूप से सऊदी अरब के प्रभाव) के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा था। अब ओपेक से अलग होने के बाद यूएई उत्पादन बढ़ा सकता है जिससे भारत को सस्ते दाम पर तेल मिलने की संभावना है।
भारत पहले से ही यूएई का सबसे बड़ा ग्राहक है। ऐसे में उत्पादन बढ़ने पर यूएई भारत को ओपेक देशों की तुलना में कम कीमत पर तेल दे सकता है। इसके अलावा हाबसान-फुजैरा पाइपलाइन के जरिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने की स्थिति में भी रोज 15-18 लाख बैरल तेल निर्यात संभव है।
दूसरा बड़ा फायदा यह है कि यूएई और अमेरिका के मजबूत संबंधों के कारण वहां से तेल खरीदने पर भारत को किसी तरह के अमेरिकी दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा, जैसा कि ईरान या रूस के मामले में होता है।
तीसरा भारत और यूएई के बीच रुपये में तेल व्यापार करने का समझौता है जिससे ‘डि-डॉलराइजेशन’ को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही यूएई की कंपनी ADNOC भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की अहम साझेदार है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई के इस कदम से ओपेक, ओपेक प्लस और रूस भी भारत को आकर्षक ऑफर देने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे भारत का आयात बिल और चालू खाता घाटा कम होने की संभावना है।
कुल मिलाकर, इस बदलाव से भारत की ऊर्जा आपूर्ति में हॉर्मुज पर निर्भरता भी घट सकती है। अब देखना होगा कि वैश्विक तेल बाजार आगे किस दिशा में जाता है।