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GDP से आगे ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना: समावेशी विकास पर सीतारमण का जोर

युवा आकांक्षाओं, किसानों, मछुआरों और जनजातीय समुदायों की भागीदारी से बनेगा नया भारत; 2047 तक विकसित राष्ट्र का लक्ष्य।

By श्वेता सिंह

Apr 28, 2026 22:53 IST

मंगलुरु: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने मंगलवार को ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को सिर्फ आर्थिक आंकड़ों तक सीमित न बताते हुए इसे समावेशी और मानवीय विकास का व्यापक लक्ष्य बताया। उन्होंने कहा कि भारत को प्रगति को अंतिम मंजिल नहीं समझना चाहिए, बल्कि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ना होगा।

NITTE में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीतारमण ने कहा कि आज के भारत की आकांक्षाएं बदल चुकी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी केवल जीविका नहीं, बल्कि उत्कृष्टता चाहती है—बेहतर शिक्षा, विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं, सार्थक रोजगार और स्वच्छ वातावरण उनकी प्राथमिकताएं हैं।

उन्होंने कहा कि “विकसित भारत” का अर्थ सिर्फ GDP वृद्धि नहीं है, बल्कि यह उस किसान (कृषिका) के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा है जो कर्नाटक के कल्याण क्षेत्र में रहता है, और उस गांव की लड़की के सपनों से भी, जो भौगोलिक या सामाजिक सीमाओं से परे वैज्ञानिक या न्यायाधीश बनने की चाह रखती है।

सीतारमण ने समावेशिता पर जोर देते हुए कहा कि यह विकास उडुपी तट के मछुआरों तक आधुनिक सुविधाएं पहुंचाएगा। इन सुविधाओं में कोल्ड स्टोरेज, डिजिटल बाजार और बीमा-पहुंचाने के साथ-साथ दंडकारण्य के जनजातीय युवाओं को भी अपनी पहचान बनाए रखते हुए विकास में भागीदारी देने का माध्यम होना चाहिए।

भारत की युवा शक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, जो दुनिया में सबसे बड़ा युवा समूह है। यह ऊर्जा और आकांक्षा भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखती है।

उन्होंने कहा कि जब भारत आगे बढ़ता है, तो दुनिया को एक ऐसा विकास मॉडल मिलता है जो शोषण या प्रतिस्पर्धा पर आधारित नहीं, बल्कि साझा समृद्धि और पारंपरिक मूल्यों पर टिका होता है।

सीतारमण ने यह भी रेखांकित किया कि ‘विकसित भारत’ एक साझी जिम्मेदारी है, जिसमें सरकार, उद्योग, शिक्षा जगत और नागरिकों की समान भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार बुनियादी ढांचा तैयार कर सकती है, लेकिन देश को आगे बढ़ाने की ताकत 140 करोड़ भारतीयों से ही आएगी।

इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 1700 में वैश्विक GDP में भारत की हिस्सेदारी करीब 24 प्रतिशत थी, जो औपनिवेशिक काल में घटकर 1947 तक 4 प्रतिशत से भी कम हो गई। उन्होंने कहा कि आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए असाधारण विकास दर अपनानी होगी।

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