मुंबई : महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पांगरे गाँव के किसान अंकुष आन्ना गुंजाल अपने खेत से भरी प्याज की बोरियों को सोलापुर के शरीफ ट्रेडर्स नामक आढ़त में ले गए। उनके पास अपनी खुद की जमीन है जिस पर उन्होंने इस साल अच्छी फसल उगाई थी। हालाकि फसल अच्छी होने के बावजूद बेचते समय उन्हें ऐसा नुकसान झेलना पड़ा कि आँखे नम हो गई। अंकुष ने कुल 72 बोरियाँ तौलने के बाद भी प्रति किलो सिर्फ 50 पैसे की दर पाई। सभी बोरियाँ बेचने के बाद उन्हें कुल 5,084 रुपये मिले लेकिन जब गाड़ी का किराया बोरियों का लाद-उतार और आढ़त के अन्य खर्च काटे गए तो उनके हाथ में सिर्फ 400 रुपये आए।
गर्मी और बारिश में कड़ी मेहनत करने के बाद इतनी मामूली राशि देखकर अंकुष ने स्थानीय मराठी मीडिया को अपने हाथ में चार सौ के नोट दिखाकर कहा बलिराज की यह दशा है। महाराष्ट्र में किसानों का सम्मान करते हुए उन्हें पुराणकालीन दानवीर राजा महाबली के साथ तुलना की जाती है, उसी सन्दर्भ में अंकुष ने यह व्यंग्य किया। केवल अंकुष ही नहीं, सोलापुर और नासिक के कृषि उत्पादन बाजार समितियों में अब यही दृश्य आम हो गया है। एक क्विंटल प्याज की दर केवल 50 रुपये रह गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसका मुख्य कारण बाजार में प्याज़ की अधिक आपूर्ति है, जबकि मांग अपेक्षाकृत कम है। कुछ महीने पहले तक भारत से पश्चिम एशिया में भारी मात्रा में प्याज निर्यात होता था लेकिन युद्ध और समुद्री परिवहन में बाधा के कारण यह निर्यात रुक गया। कंटेनर का किराया अत्यधिक बढ़ गया जिससे प्याज बंदरगाहों पर पड़ी-पड़ी सड़ रही है। यही कारण है कि किसान कम दर में भी प्याज बेचने के लिए मजबूर हैं।
बदले मौसम ने स्थिति और बिगाड़ दी है। महाराष्ट्र में इस गर्मी में प्याज़ का भंडारण सामान्यतः किया जाता है और बाद में ऊँचे दाम पर बेचा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गाड़ोया’ कहा जाता है। इस बार अत्यधिक तापमान (85 डिग्री सेल्सियस के करीब) और बेमौसमी बारिश के कारण प्याज में ब्लैक मोल्ड और नमी के नुकसान से किसान और भी कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि महाराष्ट्र का यह प्याज जल्द ही पश्चिम बंगाल के बाजार में पहुँच सकता है जिससे वहा के किसान भी आर्थिक नुकसान झेल सकते हैं।