भोपाल : मध्यप्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में मातृत्व की अनोखी कहानी जीवंत हो रही है। अफ्रीका से लाए गए और भारत के जंगल में जन्मे चिताओं की कुल संख्या अभी 57 है। इस जंगल में माताओं की अनुपस्थिति और मातृत्व की कठिनाइयों के बावजूद, माताओं और उनके बच्चों की जीवंतता ने मातृ-दिवस के अवसर पर हर किसी का मन मोह लिया। बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान के मशहूर संवाद "तुम्हारी माँ तो होगी न?" जैसी सच्चाई यहां प्रत्यक्ष रूप में सामने आती है। हर चिता की माँ नहीं होती कुछ के पास होती है कुछ के पास नही और कुछ के लिए माँ बनना भी मुमकिन नहीं।
2022 और 2023 में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से दो बार चिताओं को भारत लाया गया। इस दौरान पांच मादा चिताओं ने सफलतापूर्वक अपना नया जीवन शुरू किया और उनके बच्चों ने कुनो की नई पीढ़ी की नींव रखी। इसके अलावा, भारत में जन्मी दो मादा चिताएं भी माताएँ बनीं। कुल मिलाकर, वर्तमान में कुनो के जंगल में सात मादा चिताएँ हैं: ज्वाला, आशा, गामिनी, बीरा, निर्भा, मुखी और केजिपी। ज्वाला भारत आने के बाद तीन बार संतान जन्म दे चुकी है। जंगल में उसकी नौ शावक हैं। हालांकि 2023 के मार्च में जन्मे चार शावकों में से तीन की मृत्यु हो गई केवल मादा चिता मुखी बची। ज्वाला की आक्रामक गर्मी और कठिनाइयों के कारण मुखी को अपनी पास नहीं रखा गया। मुखी का जीवन अधिकांशतः अकेले ही बीता लेकिन उसने कठिनाइयों का सामना करते हुए अपनी शक्ति और साहस दिखाया।
मुखी ने स्वतंत्र जंगल में रहते हुए इतिहास रचा। 2025 के नवंबर में उसने पाँच शावकों को जन्म दिया। यह भारत में जन्मी पहली चिताशावक पीढ़ी थी, जिसने कुनो के जंगल में नई पीढ़ी की शुरुआत की। इसके अलावा, निर्भा, बीरा और गामिनी भी दो बार मातृत्व का अनुभव कर चुकी हैं। पिछले चार वर्षों में भारत में कुल 49 चिताओं का जन्म हुआ जिनमें से 37 जीवित हैं।
इन माताओं की वजह से कुनो के जंगल में 5000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में चिताओं की उपस्थिति और शक्ति देखी जा सकती है। मातृत्व की कठिनाइयों, बच्चों को खोने के दर्द और संघर्षों के बावजूद, माताओं ने अपने साहस और लगन से नए जीवन को जन्म दिया है। मुखी जैसे मातृ-चिता ने अपने बच्चों को जिनके पास अपनी माँ का साया नहीं था पूर्ण स्नेह और समर्पण के साथ बड़ा किया। कुनो के जंगल में मातृत्व की यह कहानी न केवल चिताओं की जीवटता का प्रतीक है बल्कि प्रकृति में जीवन और संघर्ष की शक्ति का भी जीवंत उदाहरण है।