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कलकत्ता हाई कोर्ट ने सहायक अध्यापकों को प्रिसाइडिंग अधिकारी के तौर पर नियुक्त करने की विज्ञप्ति खारिज की

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से विज्ञप्ति जारी करने की वजह पूछी गयी थी। कोई जवाब न दे पाने की स्थिति में आयोग को हाई कोर्ट की फटकार भी पड़ी थी।

By Amit Chakraborty, Moumita Bhattacharya

Apr 17, 2026 14:44 IST

कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने चुनाव आयोग की उस विज्ञप्ति को आज खारिज कर दिया जिसमें राज्य के कॉलेजों व विश्वविद्यालयों के सहायक अध्यापकों को प्रिसाइडिंग अधिकारी के तौर पर नियुक्त करने का आदेश दिया गया था। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से विज्ञप्ति जारी करने की वजह पूछी गयी थी।

कोई जवाब न दे पाने की स्थिति में आयोग को हाई कोर्ट की फटकार भी पड़ी थी। अब शुक्रवार को मामले की अगली सुनवाई के दौरान उस विज्ञप्ति को ही हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।

न्यायाधीश कृष्णा राय ने कहा कि सहायक अध्यापकों के वेतन और उनके पद को मद्देनजर रखते हुए अगर उन्हें चुनाव में काम दिया गया तभी उन्हें चुनाव से संबंधित कार्यों के लिए नियुक्त किया जा सकता है। सहायक अध्यापकों को क्यों बूथ पर भेजा जा रहा है, यह सवाल बार-बार चुनाव आयोग से पूछा गया था लेकिन आयोग कोई जवाब नहीं दे सका। इस वजह से ही हाई कोर्ट ने ही इस विज्ञप्ति को खारिज करने का फैसला लिया।

चुनाव आयोग की इस विज्ञप्ति के खिलाफ ही कॉलेज की अध्यापिका रुपा बंद्योपाध्याय ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले में आयोग की वकील अनामिका पांडे ने गुरुवार को तर्क दिया था कि 2010 के आदेश को बदलकर वर्ष 2023 में चुनाव आयोग ने नई विज्ञप्ति जारी की। निर्वाचन कानून की धारा संख्या 26 के मुताबिक कॉलेज-विश्वविद्यालयों के अध्यापकों को इस काम में नियुक्त करने का अधिकार जिला निर्वाचन अधिकारी के पास है।

इस तर्क को सुनकर न्यायाधीश राव ने आयोग को तेज फटकार लगायी। उन्होंने कहा कि इस धारा के आधार पर न्यायाधीशों को भी चुनाव के काम में आयोग नियुक्त करें। क्या यह कोई मजाक वाली बात है! हर बार चुनाव आयोग अपनी विज्ञप्ति में बदलाव कर रहा है लेकिन कोई स्पष्ट विज्ञप्ति जारी नहीं कर रहा है।

शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि कॉलेज के अध्यापकों को प्रिसाइडिंग अधिकारी के काम से मुक्ति देकर आयोग 'रिजर्व' में रखी गयी केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के कर्मचारियों को उक्त काम में नियुक्त करें। आयोग का कहना था चुनाव के काम में बस कुछ दिन ही बाकी है। ऐसी परिस्थिति में अगर अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करती है तो समस्या हो सकती है। लेकिन चुनाव आयोग के तर्क को आखिरकार हाई कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।

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