नयी दिल्ली/कोलकाताः पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर अब अपील ट्राइब्यूनलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस मुद्दे को देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष मौखिक रूप से उठाया गया, जिसके बाद अदालत ने तत्काल संज्ञान लेते हुए सोमवार को ही कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से विस्तृत रिपोर्ट मांगे जाने की बात कही।
यह मामला उस समय उठा जब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची के खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने ट्राइब्यूनलों के कामकाज को लेकर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सर्वोच्च अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अपील ट्राइब्यूनल सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं।
अधिवक्ता कामत ने अदालत को बताया कि ट्राइब्यूनलों में वकीलों को अपने मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। आवेदन जमा करने की पारंपरिक ऑफलाइन व्यवस्था भी बंद कर दी गई है। केवल ऑनलाइन माध्यम से आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं, जिससे दूरदराज़ से आने वाले या डिजिटल प्रक्रिया से अपरिचित आम नागरिकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
कामत ने अपनी दलील में कहा कि स्थिति बेहद गंभीर है। उनके अनुसार, “अपील ट्राइब्यूनल काम नहीं कर रहे हैं। वकीलों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है और केवल इंटरनेट आधारित आवेदन ही स्वीकार किए जा रहे हैं। इससे हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए आवेदन करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है।”
इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने बार-बार इस तरह के आवेदन आने पर कुछ नाराज़गी जताई। उन्होंने टिप्पणी की कि इस दिशा में कुछ न कुछ रणनीति अपनाई जा रही है और प्रतिदिन नए आवेदन दायर किए जा रहे हैं। हालांकि इसके जवाब में अधिवक्ता कामत ने पुनः जोर देकर कहा कि अदालत के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है और इस संबंध में उन्होंने समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्टों का भी हवाला दिया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट कहा कि अदालत इस मामले को हल्के में नहीं लेगी। उन्होंने निर्देश दिया कि इसी दिन कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से इस पूरे प्रकरण पर रिपोर्ट मंगाई जाएगी ताकि वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सके।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया था कि जिन आवेदनों का निपटारा मतदान की निर्धारित तिथि से दो दिन के भीतर होना है, उन सभी आवेदकों के मताधिकार को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को निर्धारित है।
इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और न्यायिक निर्देशों के पालन को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जिस पर अब सर्वोच्च न्यायालय की सीधी निगरानी बनी हुई है।