कोलकाता : पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय मुद्दों का फोकस तेजी से बदलता नजर आ रहा है। रोजगार, महंगाई और संस्थाओं के कमजोर होने जैसे अहम सवाल अभी भी मौजूद हैं लेकिन चुनावी बहस अब पहचान और नागरिकता के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि असली मुद्दे जैसे रोजगार और महंगाई खत्म नहीं हुए हैं लेकिन पहचान का सवाल ज्यादा डर और गहरा ध्रुवीकरण पैदा कर रहा है। यही वजह है कि अब रोजगार की बजाय इस बात पर ज्यादा चर्चा हो रही है कि “कौन बाहरी है”।
जमीनी स्तर पर देखा जाए तो अब एक ही सवाल सबसे ज्यादा हावी है—“किसका नाम सूची से हट गया?” “हटाए गए नाम” अब चुनावी माहौल का सबसे भावनात्मक मुद्दा बन चुका है। खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में स्कूल भर्ती घोटाले, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे अभी भी चर्चा में हैं लेकिन चाय की दुकानों, क्लबों और गांव के चौपालों में बातचीत बार-बार मतदाता सूची से नाम हटने पर ही लौट आती है।
नदिया और उत्तर 24 परगना के मतुआ बहुल इलाकों में यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है। यहां भारतीय जनता पार्टी की राजनीति लंबे समय से नागरिकता संशोधन कानून के जरिए नागरिकता देने के वादे पर आधारित रही है जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कल्याणकारी योजनाओं और संगठन के दम पर इसका मुकाबला किया है। साथ ही उसने भाजपा पर शरणार्थियों को सिर्फ राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।
अब मतुआ परिवारों के बीच नया डर यह है कि वर्षों से मतदान करने के बावजूद क्या उनका नाम मतदाता सूची में बना रहेगा। तृणमूल कांग्रेस के नेता ज्योतिप्रिया मलिक ने दावा किया कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया ने शरणार्थी परिवारों में “घबराहट” पैदा कर दी है। वहीं भाजपा ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया असली शरणार्थियों और अवैध घुसपैठियों के बीच फर्क स्पष्ट करती है।
अल्पसंख्यक बहुल जिलों जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा और दक्षिण 24 परगना में माहौल अलग जरूर है लेकिन उतना ही तनावपूर्ण भी है। यहां “हटाए गए मतदाता” और “फर्जी वोटर” जैसे शब्द राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आ गए हैं। भाजपा का कहना है कि इस प्रक्रिया से उन कथित घुसपैठियों का खुलासा हुआ है जिन्हें सत्तारूढ़ दल संरक्षण देता रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे बंगाली भाषी मुस्लिमों को निशाना बनाने की कोशिश बता रही है।
यह चिंता अब कोलकाता के मध्यमवर्गीय इलाकों—भवानीपुर, बालीगंज और न्यू टाउन—तक भी पहुंच गई है। आवासीय परिसरों और बस्तियों में रहने वाले लोग इस बात को लेकर चर्चा कर रहे हैं कि क्या प्रवासी किरायेदार, घरेलू कामगार या लंबे समय से रह रहे परिवार भी मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम का कहना है कि चुनावी बहस अब शासन के मुद्दों से हटकर पहचान के सवाल पर आ गई है। उनके मुताबिक, पहले यह चर्चा होती थी कि क्या तृणमूल कांग्रेस ने बेहतर काम किया या क्या भाजपा ममता बनर्जी को चुनौती दे सकती है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है—“क्या मैं मतदाता बना रहूंगा?”
विशेषज्ञों के अनुसार, यही बदलाव इस मुद्दे को अन्य चुनावी मुद्दों से अलग और अधिक प्रभावशाली बना रहा है।