नयी दिल्लीः मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब समुद्री कारोबार पर दिखने लगा है, जहां जहाजों के बीमा महंगे हो रहे हैं और शिपिंग कंपनियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब समुद्री कारोबार पर भी नजर आने लगा है। कई जगह जहाजों के लिए बीमा लेना महंगा हो गया है। कुछ बीमा कंपनियां जोखिम के चलते कवर देने से भी बच रही है। जिससे शिपिंग गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं।
इस बार स्थिति थोड़ी अलग नजर आ रही है। बात होर्मुज स्ट्रेट की तेल रूट समस्या तक नहीं रह गई है। बीमा लागत खुद एक बड़ी परेशानी बन रही है। खासकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए वॉर-रिस्क प्रीमियम पहले के करीब 0.2–0.25 फीसदी से बढ़कर अब 1 प्रतिशत या उससे ज्यादा हो गया है। जिससे ऑपरेशन खर्च तेजी से बढ़ रहा है। आइए जानते हैं, इस विषय में।
महंगे बीमा से बढ़ी शिपिंग की चुनौती
एक बड़े ऑयल टैंकर की कीमत करीब 1,500 करोड़ से 2,500 करोड़ रुपये तक होती है। ऐसे में बीमा की रेट में 1 फीसदी का अंतर होने पर सिर्फ एक सफर में ही खर्च कई करोड़ रुपये तक बढ़ जाता है। जिससे पूरी लागत पर असर पड़ता है।
कंपनियों की बढ़ रही ऑपरेशनल लागत
होर्मुज स्ट्रेट से वैश्विक तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में कई कंपनियां सुरक्षित रास्ता चुनते हुए अफ्रीका के रास्ते लंबा सफर कर रही हैं। जिससे 10–15 दिन का अतिरिक्त समय लग रहा है और ईंधन के साथ ऑपरेशनल लागत भी बढ़ रही है। कई मामलों में तो इंश्योरेंस कंपनियां बीमा करने से मना भी कर रही है।
बीमा न मिलने से बढ़ी मुश्किलें
न्यूज एजेंसी Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में समुद्री बीमा कंपनियां अब जहाजों को वॉर-रिस्क कवर देने से मना कर रही है। इससे शिपिंग कंपनियों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि बिना बीमा के जहाजों का संचालन नहीं किया जा सकता है।
कार्गो की फाइनेंसिंग, पोर्ट एंट्री या कॉन्ट्रैक्ट पूरे करने के लिए बीमा का होना जरूरी है। ऐसे में जहाज मालिकों के सामने एक चुनौती खड़ी हो गई है। उनके पास दो ही विकल्प बच रहे हैं, या तो वे महंगे प्रीमियम पर बीमा खरीदें या फिर जोखिम वाले रूट से कारोबार न करें।