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संसद के 16–18 अप्रैल विशेष सत्र को लेकर सियासी विवादः महिला आरक्षण विधेयक व चुनावी टाइमिंग पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने

चुनावी व्यस्तता और विपक्ष की गैरहाजिरी को लेकर सरकार पर उठे कई बड़े सवाल, चिदंबरम ने बताया संदेहास्पद कदम

By डॉ. अभिज्ञात

Apr 05, 2026 15:32 IST

नयी दिल्लीः16 से 18 अप्रैल के बीच प्रस्तावित संसद के विशेष सत्र को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने इस सत्र के समय पर सवाल उठाते हुए इसे संदेहास्पद बताया और विपक्ष से इसका विरोध करने की अपील की है। उनका मानना है कि यह सत्र ऐसे समय बुलाया गया है जब कई सांसद चुनावी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहेंगे।


चुनावी व्यस्तता और प्रतिनिधित्व का सवाल

चिदंबरम ने कहा कि तमिलना़डु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल (पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को भी मतदान) होने वाला है। ऐसे में इन राज्यों के कुल 67 विपक्षी सांसद तमिलनाडु के 39 और पश्चिम बंगाल के 28 सांसद 16 से 18 अप्रैल के बीच अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त रहेंगे। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि इन दिनों में कोई महत्वपूर्ण विधेयक, खासकर संविधान संशोधन से जुड़े प्रस्ताव, चर्चा या मतदान के लिए लाए जाते हैं तो ये सांसद उसमें भाग कैसे ले पाएंगे। उनके अनुसार सत्र का समय इस तरह तय किया गया प्रतीत होता है कि कुछ सांसद प्रक्रिया से बाहर रह जाएं।


सरकार का एजेंडा: महिला आरक्षण कानून को आगे बढ़ाना

सरकार की ओर से किरेन रिजिजु ने घोषणा की है कि इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण कानून-“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” पर चर्चा और आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है। यह विधेयक 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन इसके लागू होने में जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं के कारण देरी हुई। अब सरकार इसे लागू करने की दिशा में कदम तेज करना चाहती है ताकि 2029 के आम चुनाव तक इसका लाभ मिल सके। इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 816 करने और उनमें करीब एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव भी सामने आया है।


प्रधानमंत्री का रुख और राजनीतिक सहमति की कोशिश

नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर सभी दलों से सहयोग की अपील की है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना देश के विकास के लिए जरूरी है और इस दिशा में सर्वसम्मति बनाना महत्वपूर्ण है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस सत्र में कानून को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक संशोधन लाए जा सकते हैं।


विपक्ष की अतिरिक्त आपत्तियां और मांग

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस सत्र को मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के खिलाफ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने बिना व्यापक सहमति के यह फैसला लिया है। उन्होंने मांग की कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर चर्चा की जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी न करने की चेतावनी भी दी।


समर्थन में उठती आवाजें

इस विधेयक को लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक वर्गों से समर्थन भी मिल रहा है। रंजना कुमारी ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया और कहा कि इसे लागू करने में देरी नहीं होनी चाहिए। वहीं निदा खान ने कहा कि यह महिलाओं को राजनीति में नई पहचान और नेतृत्व का अवसर देगा। बीजेपी के शहज़ाद पूनावाला ने विपक्ष से अपील की है कि वे इस मुद्दे पर पीछे न हटें और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए एकजुट हों।


समानांतर विवाद: विदेशी अंशदान विनियमन कानून संशोधन पर भी टकराव

इसी दौरान विदेशी अंशदान विनियमन कानून (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर भी विवाद सामने आया है। डीएमके के सरवनन अन्नादुरई ने आरोप लगाया कि यह संशोधन ईसाई संगठनों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है। वहीं कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने इसे कठोर कानून बताते हुए इसका विरोध किया। हालांकि सरकार की ओर से किरण रिजिजु ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है और इससे केवल अवैध विदेशी फंडिंग वाले खातों पर असर पड़ेगा।

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