धार (मध्य प्रदेश): लंबे समय से चर्चा में रहे भोजशाला-कमाल मौला परिसर विवाद ने एक बार फिर कानूनी मोड़ ले लिया है। मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें इस स्थल को भोजशाला मंदिर माना गया था।
कमाल मौला मस्जिद के केयरटेकर काजी मोइनुद्दीन की ओर से स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) दाखिल की गई है। यह याचिका 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में (डायरी नंबर 32281/2026) दायर की गई है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान ऐतिहासिक रूप से कमाल मौला मस्जिद रहा है और यहां लंबे समय से नमाज पढ़ी जाती रही है। वहीं, हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान देवी सरस्वती को समर्पित प्राचीन भोजशाला मंदिर है।
इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 15 मई 2026 को अपने विस्तृत फैसले में कहा था कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप भोजशाला मंदिर का है। अदालत ने यह भी माना था कि यहां देवी सरस्वती (वाग्देवी) की पूजा का ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद है।
हाईकोर्ट ने अपने 242 पन्नों के फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की 2024–26 की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट (2189 पन्नों) का हवाला दिया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार बहाल किया और 2003 के पुराने समझौते को आंशिक रूप से रद्द कर दिया।
उस समझौते में हिंदुओं की पूजा पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे और शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुझाव दिया था कि वे धार जिले में वैकल्पिक जमीन के लिए आवेदन कर सकते हैं।
फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिलेगी। कमाल मौला वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष रखेंगे और यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि यहां सदियों से नमाज होती रही है। उन्होंने सभी से शांति बनाए रखने की अपील भी की है।
वर्तमान स्थिति में प्रशासन ने परिसर में नमाज की अनुमति रोक दी है। इसके चलते मुस्लिम समुदाय घरों या निजी स्थानों पर नमाज अदा कर रहा है, जबकि हिंदू पक्ष परिसर में नियमित पूजा कर रहा है। पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है।
भोजशाला परिसर को 11वीं शताब्दी में राजा भोज द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केंद्र माना जाता है, जिसे विद्या की देवी सरस्वती से जोड़ा जाता है। यह मामला कई दशकों से विवाद का विषय रहा है और समय-समय पर अदालतों तक पहुंचता रहा है।
इस बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए मुस्लिम पक्ष का समर्थन किया है। वहीं, हिंदू पक्ष भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल करने की तैयारी में है। अब इस मामले की अंतिम सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी, जो आगे की दिशा तय करेगी।