नई दिल्ली : देश में कानून का शासन है। समाज आज आधुनिक सोच का दावा करता है। इन बड़े-बड़े दावों के बीच भारत में दहेज या पण्य की मांग के कारण महिला हत्या और उत्पीड़न की घटनाएँ आज भी लगातार जारी हैं। हाल ही में भोपाल में त्वीषा शर्मा की मृत्यु के मामले में यह आरोप सामने आया। उससे पहले ग्रेटर नोएडा में दीप्तिका नागर की मौत के मामले में भी इसी तरह के आरोप लगे थे। वास्तव में हाल के समय में इस प्रकार की कई घटनाएँ सामने आई हैं और मीडिया में सुर्खियाँ बनी हैं। लेकिन इस अपराध की वास्तविक व्यापकता का खुलासा भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से होता है जो देश की सामाजिक व्यवस्था की एक अत्यंत अंधकारमय और शर्मनाक तस्वीर प्रस्तुत करता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो
प्रतिदिन 16 मौतें, राजधानी दिल्ली सबसे ऊपर
6 मई को जारी “क्राइम इन इंडिया 2024” रिपोर्ट के अनुसार 2024 में भारत में दहेज संबंधी उत्पीड़न के कारण कुल 5,737 महिलाओं की मृत्यु दर्ज की गई। ये वे मामले हैं जो आधिकारिक रूप से दर्ज हुए। इसका सीधा और कठोर अर्थ यह है कि आज भी देश में हर दिन औसतन लगभग 16 महिलाएँ दहेज उत्पीड़न की शिकार होकर अपनी जान गंवा रही हैं।
महानगरीय शहरों की सूची में लगातार पाँचवें वर्ष शीर्ष स्थान पर देश की राजधानी दिल्ली है। 2024 में दिल्ली में दहेज उत्पीड़न से जुड़ी मौतों के 109 मामले दर्ज हुए जिनमें कुल 111 महिलाओं की मृत्यु हुई। इस सूची में दूसरे स्थान पर कानपुर (54 मामले) और तीसरे स्थान पर बेंगलुरु (25 मामले) रहे।
आंकड़ों के अनुसार दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में दहेज उत्पीड़न से मृत्यु दर प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 1.4 है। इसके विपरीत दक्षिण भारत के कई बड़े शहरों जैसे चेन्नई और कोच्चि में 2024 में दहेज-जनित मृत्यु के मामले शून्य दर्ज किए गए।
राज्यवार आंकड़ों में उत्तर प्रदेश और बिहार आगे
दहेज निषेध कानून 1961 में लागू किया गया था। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304B को अब भारतीय न्याय संहिता में धारा 80 के रूप में लागू किया गया है। इस कानून के अनुसार यदि विवाह के सात वर्षों के भीतर किसी महिला की अस्वाभाविक मृत्यु होती है और मृत्यु से पहले दहेज उत्पीड़न के प्रमाण मिलते है तो उसे दहेज-हत्या माना जाता है।
वर्ष 2023 में इस कानून के तहत पूरे देश में 15,000 से अधिक मामले दर्ज हुए (15,489)। यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 14 प्रतिशत अधिक थी। राज्यवार सूची में शीर्ष पर उत्तर प्रदेश (7,151 मामले), दूसरे स्थान पर बिहार (3,665 मामले) और तीसरे स्थान पर कर्नाटक (2,322 मामले) रहे।
हाल की घटनाएँ जिन्होंने देश को झकझोर दिया
हाल के कुछ मामलों ने पूरे समाज को स्तब्ध कर दिया है। उदाहरण के लिए, नोएडा की निवासी 33 वर्षीय त्वीषा शर्मा। शादी के मात्र 5 महीने बाद 12 मई को भोपाल के कतारा हिल्स क्षेत्र में उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गई। मृत्यु से पहले उन्होंने अपनी माँ को भेजा अंतिम संदेश था—“मुझे बहुत दम घुट रहा है माँ”—जिसने सोशल मीडिया पर व्यापक विरोध को जन्म दिया।
इसके अलावा ग्रेटर नोएडा की 24 वर्षीय दीप्तिका नागर का मामला भी सामने आया, जहाँ परिवार ने शादी में लगभग 1 करोड़ रुपये खर्च किए थे इसके बावजूद अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उन्हें कथित रूप से छत से फेंककर हत्या किए जाने का आरोप लगा।
इतना ही नहीं वर्ष 2026 के जनवरी में एक महिला एसडब्ल्यूएटी (SWAT) कमांडो की भी उसके पति द्वारा दहेज की मांग को लेकर हत्या किए जाने का आरोप सामने आया। विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना दर्शाती है कि उच्च पदों पर कार्यरत या सुरक्षा बलों से जुड़े लोग भी इस सामाजिक बुराई से अछूते नहीं हैं।
समाजशास्त्रियों के अनुसार ऐसी सामाजिक बुराइयों का समाधान केवल कठोर कानूनों से संभव नहीं है। दहेज जैसी समस्या को समाप्त करने के लिए समाज की मानसिकता में व्यापक परिवर्तन आवश्यक है। त्वीषा और दीप्तिका जैसे मामलों की दुखद घटनाएँ तथा एनसीआरबी के ये भयावह आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि केवल कानूनी सुरक्षा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन और समाज दोनों को अधिक संवेदनशील और सक्रिय होना होगा।