नई दिल्ली : जनगणना मामला को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में दायर याचिका पर बुधवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस याचिका में मांग की गई थी कि जनगणना के साथ जातिगत गणना न की जाए। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्य कांत के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि इस विषय में निर्णय लेना केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के नीतिगत निर्णयों में न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि यह निर्णय कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए या नहीं पूरी तरह सरकार की नीतिगत प्रक्रिया का हिस्सा है। साथ ही उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि समाज में पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या का पता लगाना सरकार के लिए आवश्यक है, ताकि कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि यदि जातिगत जनगणना की जाती है तो इसके आंकड़ों का दुरुपयोग विभिन्न संस्थाओं द्वारा किया जा सकता है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भविष्य में जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके जवाब में अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2027 की जनगणना में जातिगत गणना शामिल होगी या नहीं, यह तय करना न्यायालय का कार्य नहीं है और यह पूरी तरह कार्यपालिका का अधिकार है। इसलिए इस विषय पर किसी प्रकार की संवैधानिक समीक्षा का प्रश्न भी नहीं उठता।
जातिगत जनगणना का मुद्दा लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में बहस का विषय रहा है। विपक्ष का मानना है कि विभिन्न जातियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने के लिए जातिगत जनगणना आवश्यक है। उनका यह भी कहना है कि जिन वर्गों को अब तक आरक्षण व्यवस्था में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है उन्हें जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उचित स्थान दिया जा सकता है।
हालांकि प्रारंभ में केंद्र सरकार इस पर अनिच्छुक थी लेकिन बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय के नेतृत्व में यह संकेत दिया गया कि आगामी जनगणना में जातिगत गणना को भी शामिल किया जा सकता है।