भीषण गर्मी और रिकॉर्ड तोड़ तापमान के बीच राजस्थान के सलूंबर जिले से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। यहां के सुप्रसिद्ध जयसमंद वन्यजीव अभ्यारण्य क्षेत्र में अचानक भीषण आग लग गई। तेज हवाओं और सूखी वनस्पति के कारण आग ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया और अब तक 100 हेक्टेयर से ज्यादा वन क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुका है। आसमान में कई किलोमीटर दूर से ही काले धुएं का विशाल गुबार साफ देखा जा सकता है, जिससे वन्यजीवों के अस्तित्व पर भी बड़ा संकट मंडरा रहा है।
दोपहर बाद अभ्यारण्य की पहाड़ियों से अचानक धुआं उठता दिखाई दिया, जो कुछ ही मिनटों में चारों तरफ फैल गया। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम और तीन दमकल वाहन तुरंत मौके पर पहुंचे। लेकिन इलाका अत्यधिक पहाड़ी, पथरीला और दुर्गम होने के कारण दमकल गाड़ियां आग के मुख्य पॉइंट तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में वनकर्मियों और आस-पास के ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर पेड़ों की हरी टहनियों, पानी और पारंपरिक संसाधनों की मदद से आग पर काबू पाने का मोर्चा संभाला है। हालांकि, चल रही तेज हवाएं आग की लपटों को और ज्यादा भड़का रही हैं।
क्यों और कैसे लगती है जंगलों में यह आग ?
अक्सर लोग हैरान होते हैं कि बिना किसी के माचिस जलाए घने जंगलों में अचानक आग कैसे भड़क जाती है ? विशेषज्ञों के मुताबिक, मई-जून के महीनों में इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण होते हैं-
1. प्राकृतिक कारण (Natural Causes): इस भीषण गर्मी में जंगल की घास और पेड़-पौधे पूरी तरह सूखकर ज्वलनशील हो जाते हैं। जब तेज हवाएं चलती हैं, तो सूखी लकड़ियों और आपस में सटे बांस के पेड़ों में तीव्र घर्षण होता है। इस रगड़ से पैदा हुई छोटी सी चिंगारी सूखी घास (कांस) के संपर्क में आते ही बारूद की तरह ब्लास्ट होती है और पूरे जंगल को लील लेती है।
2. मानवीय लापरवाही (Human Negligence): कई बार अभ्यारण्य क्षेत्र या उसके रास्तों से गुजरने वाले चरवाहे, स्थानीय लोग या पर्यटक जलती हुई बीड़ी, सिगरेट या माचिस की तीली लापरवाही से फेंक देते हैं, जो इस मौसम में दावानल (जंगल की आग) का रूप ले लेती है।
पर्यावरण को दोहरा झटका
100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में जल रही हरी-सूखी लकड़ियों और वनस्पतियों के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा हैभारी मात्रा में कार्बन और थर्मल एनर्जी (उष्मीय ऊर्जा) निकलने के कारण सलूंबर और उसके आस-पास के गांवों का स्थानीय तापमान 3 डिग्री से 5 डिग्री तक तुरंत बढ़ सकता है, जिससे पहले से जारी हीटवेव और जानलेवा हो जाएगी।
जंगल की आग से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) और सघन धुआं निकलता है। इससे हवा इतनी भारी हो जाती है कि निचले स्तर की गर्म हवा ऊपर आसमान में नहीं जा पाती। नतीजतन, प्रभावित इलाका एक बंद भट्टी (हीट डोम) की तरह तपने लगता है, जो इंसानों और बेजुबान वन्यजीवों दोनों के लिए बेहद खतरनाक है।