नई दिल्ली : हर साल 3 अप्रैल को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस दिन पत्रकारों और समाचार संस्थानों की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र में मीडिया की अहमियत पर चर्चा होती है। विभिन्न संगठनों की ओर से पत्रकारों के समर्थन में बयान जारी किए जाते हैं और सच लिखने की आजादी को मजबूत करने की बात कही जाती है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पूरी तरह स्वतंत्र और निडर है?
समाचार पत्र या मीडिया सिर्फ खबरें देने का माध्यम नहीं है। इसके पीछे पत्रकारों की लगातार मेहनत और संघर्ष छिपा होता है। तेज धूप, तूफान, प्राकृतिक आपदा या संघर्षपूर्ण हालात में भी पत्रकार लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने का काम करते हैं। समाज के उन हिस्सों की आवाज बनते हैं जिनकी बातें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।
यह दिवस हर साल यूनेस्को की पहल पर मनाया जाता है। इस वर्ष प्रेस स्वतंत्रता दिवस का विषय रखा गया है - “Shaping a Future at Peace: Promoting Press Freedom for Human Rights, Development, and Security।” इसका मतलब है कि शांतिपूर्ण और सुरक्षित भविष्य के लिए स्वतंत्र मीडिया, मानवाधिकारों की रक्षा और विकास में अहम भूमिका निभाएगा।
इसी बीच ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ यानी आरएसएफ ने वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2026 जारी किया है। इस सूची में 180 देशों को शामिल किया गया है। भारत को इस बार 157वां स्थान मिला है। यह रैंकिंग इस आधार पर तैयार की जाती है कि किसी देश में मीडिया कितनी स्वतंत्रता से काम कर सकता है वहां की खबरों की विश्वसनीयता कैसी है और पत्रकारों की सुरक्षा कितनी मजबूत है।
सूची में पाकिस्तान 153वें और श्रीलंका 134वें स्थान पर हैं। ऐसे में भारत की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या देश में प्रेस की स्वतंत्रता अभी भी चुनौतियों का सामना कर रही है।
डिजिटल दौर में फर्जी खबरों का तेजी से फैलना मीडिया के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। सही जानकारी जुटाना, उसकी जांच करना और फिर लोगों तक सच्ची खबर पहुंचाना अब पहले से ज्यादा कठिन हो गया है। राजनीतिक तनाव, युद्ध, दुष्प्रचार और मीडिया की आवाज दबाने की कोशिशों के बीच पत्रकार लगातार जोखिम उठाकर काम कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में दुनिया भर में कई पत्रकारों की मौत और हमले चिंता का कारण बने हैं। ‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेन की पत्रकार विक्टोरिया रोशचिना रूसी कब्जे वाले इलाके में लापता होने के बाद 2025 में मृत पाई गईं। जांच में उनके साथ प्रताड़ना के आरोप भी सामने आए।
गाजा में रिपोर्टिंग के दौरान 2026 में पत्रकार मोहम्मद समीर वाशा की इजरायली ड्रोन हमले में मौत हो गई थी। दक्षिण लेबनान में एयर स्ट्राइक के दौरान पत्रकार अमल खलील भी मारे गए। वहीं गाजा संघर्ष को कवर करते समय पत्रकार मरियम डग्गा की भी जान चली गई।
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में दुनिया भर में रिकॉर्ड 129 पत्रकार और मीडिया कर्मियों की हत्या हुई जो हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा संख्या है।
आज पत्रकारिता दुनिया के सबसे जोखिम भरे पेशों में शामिल हो चुकी है खासकर युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता वाले क्षेत्रों में। इसके बावजूद पत्रकार लगातार लोगों तक सच पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
जाम्बिया की राजधानी लुसाका में आयोजित वैश्विक सम्मेलन में इस वर्ष प्रेस की स्वतंत्रता के साथ-साथ मानवाधिकार, लोकतंत्र, विकास और सुरक्षित भविष्य बनाने में मीडिया की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि एक मजबूत और स्वतंत्र मीडिया ही समाज को सही दिशा दे सकता है।