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समुद्र के नीचे लहराया तिरंगा! गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड में अंडमान और निकोबार ने दर्ज करवाया अपना नाम

अंडमान और निकोबार प्रशासन ने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए राधानगर बीच पर दुनिया का सबसे बड़ा तिरंगा फहराया है। लेकिन यह तिरंगा भूमि पर नहीं बल्कि ...

By Moumita Bhattacharya

May 02, 2026 19:17 IST

अंडमान और निकोबार प्रशासन ने शनिवार को अपने नाम एक नया गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Records) दर्ज करवा लिया। यह रिकॉर्ड ऐसा है जिसके बारे में जानकर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा।

अंडमान और निकोबार प्रशासन ने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए राधानगर बीच पर दुनिया का सबसे बड़ा तिरंगा फहराया है। लेकिन यह तिरंगा भूमि पर नहीं बल्कि नीले समुद्र के पानी के भीतर फहराया गया है।

मिली जानकारी के अनुसार हैवलॉक द्वीप पर समुद्र के नीचे जिस तिरंगे को फहराया गया है वह 60 मीटर चौड़ा और 40 मीटर लंबा है। इसे कई एजेंसियों और प्रशिक्षित गोताखोरों ने समन्वित अभियान के तहत समुद्र के नीले पानी के नीचे लहराया।

इस काम को जिन गोताखोरों की टीम ने अंजाम दिया उसे अंडमान और निकोबार पुलिस, वन विभाग, भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक वाहिनी और अन्य डाइविंग केंद्रों के स्कूबा डाइवर्स भी शामिल थे। इस विशेष मौके पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल डी.के. जोशी, मुख्य सचिव चंद्र भुषण कुमार और पुलिस महानिदेशक एच.एस. धालीवाल समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

शनिवार की सुबह 10.35 बजे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के निर्णायक ऋषि नाथ की उपस्थिति में इस उपलब्धि की औपचारिक रूप से पुष्टि की गयी और डी. के. जोशी को प्रमाणपत्र सौंप दिया गया।

इस मौके पर अपने संबोधन में डी. के. जोशी ने इस पूरे अभियान में शामिल सभी टीमों की सराहना की। उन्होंने सभी टीमों के समन्वय और समर्पण की तारीफ करते हुए इसे द्वीपसमूह की अनोखी उपलब्धियों में एक महत्वपूर्ण बताया।

बता दें, रविवार (3 मई) को भी एक नया गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की तैयारी की जा रही है। इसमें स्वराज द्वीप (हैवलॉक) पर ही लाइटहाउस डाइव साइट पर सबसे ऊंचे मानव स्तंभ को बनाने की कोशिश की जाएगी। बताया जाता है कि इस मौके पर भी उपराज्यपाल समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के उपस्थित होने की संभावना है।

दावा किया जाता है कि यह उपलब्धियां अंडमान और निकोबार में एडवेंचर टूरिज्म, समुद्री गतिविधियों को बढ़ाने और द्वीप समूह की पहचान को वैश्विक स्तर पर ले जाने में मददगार साबित होगी।

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