ओटाना : फुटबॉल विश्वकप जैसे वैश्विक मंच पर भी नो हैंडशेक पॉलिसी की झलक देखने को मिली जब सुलह कराने की कोशिश ही विवाद का कारण बन गई। जियान्नी इन्फान्तिनो ने इजरायल और फिलिस्तीन के फुटबॉल अधिकारियों को एक साथ लाकर एकता का संदेश देने की पहल की थी लेकिन यह प्रयास उल्टा तनाव बढ़ाने वाला साबित हुआ।
फीफा कांग्रेस (FIFA Congress) के दौरान अचानक माहौल असहज और तनावपूर्ण हो गया। मंच पर इजरायल और फिलिस्तीन के प्रतिनिधियों को साथ लाकर प्रतीकात्मक एकता दिखाने की कोशिश की गई। लेकिन वर्षों से चले आ रहे संघर्ष का असर उसी क्षण साफ दिखाई दिया। फिलिस्तीन के प्रतिनिधि ने खुले तौर पर हाथ मिलाने से इनकार कर दिया और यह दृश्य तुरंत सबका ध्यान खींचने लगा।
करमर्दन से इनकार, मंच पर बढ़ी असहजता
फिलिस्तीन फुटबॉल संघ के अध्यक्ष जिब्रिल राजौब और इजरायल फुटबॉल संस्था के सह-उपाध्यक्ष बासिम शेख सुलिमान ने अलग-अलग अपने विचार रखे। इसके बाद इन्फान्तिनो ने दोनों से प्रतीकात्मक हाथ मिलाने का आग्रह किया। लेकिन राजौब ने इसे साफ तौर पर ठुकरा दिया और मंच पर ही दूरी बना ली। उन्होंने माइक्रोफोन से हटकर अपनी आपत्ति जताई और फिर मंच छोड़कर चले गए। उस समय उन्हें कहते हुए सुना गया की हम पीड़ा में हैं।
बाद में फिलिस्तीन फुटबॉल संघ की सह-उपाध्यक्ष सुसान शालाबी ने कहा की मैं ऐसे किसी व्यक्ति से हाथ नहीं मिला सकती जिसका इस्तेमाल अन्याय को ढकने के लिए किया जा रहा हो। हम कष्ट में हैं।
फुटबॉल मंच पर राजनीति की छाया
इस घटना के बाद इन्फान्तिनो ने दोनों पक्षों से एक साथ आगे आने की अपील की। उन्होंने कहा कि फुटबॉल सिर्फ खेल नहीं है बल्कि लोगों को जोड़ने की ताकत रखता है। इसलिए एकता बनाना जरूरी है और बच्चों के लिए बेहतर भविष्य के लिए सभी को साथ चलना होगा।
इस दौरान राजौब ने इजरायल के खिलाफ कई आरोप भी लगाए। उनका कहना था कि वेस्ट बैंक की बस्तियों में इजरायली क्लबों की गतिविधियां फीफा के नियमों का उल्लंघन कर रही हैं। इस मामले को अंतरराष्ट्रीय खेल मध्यस्थता न्यायालय यानी कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोर्ट में भी ले जाया जा चुका है। दूसरी ओर इजरायल के प्रतिनिधि यारिव टेपर ने कहा कि उनका संगठन हमेशा सहयोग के पक्ष में है और फुटबॉल के जरिए बेहतर भविष्य बनाने की कोशिश करता है।
इन्फान्तिनो की भूमिका पर उठते सवाल
जियान्नी इन्फान्तिनो के नेतृत्व को लेकर लंबे समय से विवाद जारी है। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे खेल के हितों से ज्यादा व्यापारिक और राजनीतिक ताकतों को प्राथमिकता देते हैं। विश्वकप के मेजबान देशों के चयन, मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों और बढ़ती व्यावसायिकता-इन सभी मामलों में उनके फैसलों पर सवाल उठे हैं। आलोचकों का मानना है कि इससे फुटबॉल आम प्रशंसकों से दूर होता जा रहा है। इसके अलावा फीफा के भीतर शक्ति को और अधिक केंद्रीकृत करने के आरोप भी उन पर लगाए गए हैं। कुल मिलाकर उनके फैसले और कदम बार-बार विवाद को जन्म देते रहे हैं।