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फिर से युद्ध हुआ तो तेल की कीमत 150 डॉलर तक पहुंचने की आशंका, भारत बढ़ा सकता है इमरजेंसी फ्यूल रिजर्व

दोनों पक्षों के बीच युद्ध की घोषणा होने के बाद अप्रैल में दुनिया भर में तेल के बाजारों में और वित्तीय मार्केट में स्थिरता वापस लौटाने की उम्मीद तो जगी थी लेकिन...

By Moumita Bhattacharya

Jun 12, 2026 21:42 IST

पिछले 3 महीनों में कई बार ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध जैसी परिस्थितियां पैदा हो गयी थी। इन परिस्थितियों की वजह से आखिरकार किसका कितना नुकसान हुआ है इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल काम है। लेकिन गुरुवार (11 जून) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस प्रकार से एक बार फिर से युद्ध का बिगुल फुंका है उससे पूरी दुनिया में डर का माहौल व्याप्त हो गया है।

अगर फिर से युद्ध जैसी परिस्थितियां पैदा हुई तो उनसे निपटने के लिए भारत ने इमरजेंसी फ्यूल रिजर्व को बढ़ाने के बारे में सभी सोच-विचार करना शुरू कर दिया है।

युद्ध जैसी परिस्थितियों की वजह से दुनिया को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ेगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। दोनों पक्षों के बीच युद्ध की घोषणा होने के बाद अप्रैल में दुनिया भर में तेल के बाजारों में और वित्तीय मार्केट में स्थिरता वापस लौटाने की उम्मीद तो जगी थी लेकिन इस बार की युद्ध घोषणाओं के साथ वह उम्मीद फिर से धुंधली नजर आ रही है।

150 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच सकती है तेल की कीमत

विशेषज्ञ कंपनी रायस्टड एनर्जी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि अगर होर्मूज जलडमरूमध्य बंद हो जाता है तो पश्चिम एशिया के देशों से प्रतिदिन लगभग 1.18 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। नतीजा यह होगा कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो सकता है।

वहीं बात अगर वर्तमान समय की करें तो इसकी कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। ऐसी स्थिति में बढ़ी कीमतों की मार पूरी दुनिया को झेलनी पडे़गी।

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युद्ध जैसी स्थिति की वजह से पिछले 3 महीनों में पहले ही लगभग 100 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति बाधित हो चुकी है। यदि होर्मूज जलडमरूमध्य भविष्य में भी बंद रहता है तो हर महीने दुनिया में लगभग 35 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो जाएगी।

जानकारों का कहना है कि होर्मूज मार्ग से होकर युद्ध से पहले प्रतिदिन औसतन 120–125 टैंकर गुजरते थे वह पिछले सप्ताह घटकर महज 10–15 रह गयी है। वहीं LNG (Liquefied Natural Gas) की शिपमेंट भी प्रतिदिन 5–6 से घटकर शून्य हो गई है।

भारत की चुनौतियां भी बढ़ेगी

भारत के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है। जानकारों का कहना है कि भारत को अपनी वार्षिक कच्चे तेल और एलपीजी जरूरतों का लगभग 88% आयात करना पड़ता है और जिसमें से करीब 50% आपूर्ति होर्मूज जलडमरूमध्य मार्ग से होकर ही आती है।

इसलिए इसका बड़ा हिस्सा पिछले 3 महीनों से प्रभावित है। अगर यह स्थिति और लंबे समय तक जारी रहती है तो देश में ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती है जो आम जनता की जेब पर बुरा असर डाल सकती है। वहीं अगर कीमतें नहीं बढ़ाई जातीं तो बढ़ती लागत और महंगाई के दबाव में अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

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सिर्फ कच्चे तेल और ईंधन ही नहीं बल्कि पैकेज्ड फूड, डेयरी उत्पाद, किराना सामान, साबुन और डिटर्जेंट, मोबाइल व इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स और प्लास्टिक उत्पादों जैसी कई वस्तुओं की आपूर्ति पर भी असर पड़ने की आशंका है। ये सभी वस्तुए होर्मूज जलडमरूमध्य से होकर ही भारत तक पहुंचती है।

ईरान द्वारा फिर से हॉर्मुज बंद करने की आशंका के मद्देनजर इन सभी सामग्रियों की आपूर्ति बाधित हो सकती है जिससे महंगाई दर में बढ़ोतरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

गुरुवार (11 जून) को केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि स्थिति की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए देश के इमरजेंसी फ्यूल रिजर्व को 90 दिन तक बढ़ाने के विशेष प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।

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