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योगासन में भारत की मजबूत जमीनी तैयारी का असर, जूनियर खिलाड़ियों ने रचा इतिहास

जूनियर और सब-जूनियर खिलाड़ियों ने जीते 46 स्वर्ण पदक, भारत की प्रतिभा का दुनिया ने देखा दम।

By शिखा सिंह

Jun 12, 2026 18:42 IST

अहमदाबाद : इस सप्ताह यहां आयोजित पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में भारत के शानदार प्रदर्शन की झलक पदक तालिका में साफ दिखाई दी, लेकिन मेजबान देश के लिए सबसे उत्साहजनक पहलू उन युवा खिलाड़ियों का उभरकर सामने आना रहा, जिनमें आने वाले वर्षों तक तिरंगे को विश्व मंच पर ऊंचा रखने की क्षमता दिखाई देती है। भारतीय योगासन के भावी युवा सितारों ने इस प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने भविष्य के लिए उम्मीदों को और मजबूत कर दिया है।

भारत ने विश्व योगासन चैंपियनशिप का समापन रिकॉर्ड 102 स्वर्ण पदकों के साथ किया। इनमें से लगभग आधे पदक देश के सबसे युवा खिलाड़ियों ने अपने नाम किए। भारत के जूनियर और सब-जूनियर खिलाड़ियों ने कुल 46 स्वर्ण पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि देश में जमीनी स्तर पर योगासन को विकसित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयास बेहद मजबूत हैं।

भारत के उज्ज्वल भविष्य की पहचान बनीं दिल्ली की 14 वर्षीय ईशिका गुच्छैत और पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की 12 वर्षीय सान्विता बनर्जी, जिन्होंने सब-जूनियर गर्ल्स रिदमिक पेयर स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

78 अन्य देशों के खिलाड़ियों के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करते हुए इस युवा जोड़ी ने अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता, तालमेल और तकनीकी दक्षता का प्रदर्शन किया। उनकी सफलता केवल एक और स्वर्ण पदक तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण थी कि भारत के पास प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की ऐसी मजबूत श्रृंखला तैयार हो रही है, जो आने वाले वर्षों में देश को इस खेल में शीर्ष पर बनाए रख सकती है।

विश्व योगासन और योगासन भारत के महासचिव जयदीप आर्य का मानना है कि भारतीय जूनियर खिलाड़ियों का प्रदर्शन इस चैंपियनशिप की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक रहा।

जयदीप आर्य ने कहा, “अहमदाबाद में आयोजित पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में भारत के जूनियर और सब-जूनियर खिलाड़ियों का प्रदर्शन वास्तव में प्रेरणादायक रहा है। भारत के कुल 102 स्वर्ण पदकों में से 46 स्वर्ण पदक जीतना केवल उनकी असाधारण प्रतिभा और समर्पण को ही नहीं दर्शाता, बल्कि यह भी साबित करता है कि देश में योगासन खेल के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा कि सबसे उत्साहजनक बात यह है कि ये उपलब्धियां हमारे सबसे युवा खिलाड़ियों ने हासिल की हैं। उनकी सफलता जमीनी स्तर पर विकास कार्यक्रमों, कोचिंग व्यवस्था की प्रभावशीलता और योगासन को एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है।

योगासन एक ऐसा खेल है जिसमें सटीकता, लचीलापन, ताकत और कलात्मक अभिव्यक्ति का अद्भुत संतुलन आवश्यक होता है। ईशिका और सान्विता ने अपने करियर के अब तक के सबसे बड़े मंच पर जिस आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन किया, उसने सभी को प्रभावित किया। हालांकि विश्व चैंपियन बनने का उनका सफर अहमदाबाद के ईकेए एरिना की चमक-दमक से बहुत दूर शुरू हुआ था।

ईशिका के जीवन में योग की शुरुआत उनके घर से हुई। उनका परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले का रहने वाला है, जो बाद में दिल्ली में बस गया। उनके पिता पान के पत्तों का व्यवसाय करके परिवार का पालन-पोषण करते हैं, जबकि उनकी मां योग की कक्षाएं संचालित करती हैं। नौ वर्ष की आयु में उनकी मां ने ही उन्हें योग की ओर प्रेरित किया।

जो शुरुआत में एक सामान्य गतिविधि थी, वह धीरे-धीरे उनके जुनून में बदल गई। कोविड-19 महामारी के दौरान, जब अधिकांश बच्चे घरों में सीमित थे, तब ईशिका ने अपने समय का उपयोग योग कौशल को निखारने, लचीलापन बढ़ाने और कठिन आसनों में महारत हासिल करने के लिए किया।

धीरे-धीरे उनके मन में भारत का प्रतिनिधित्व करने और बड़े मंचों पर पदक जीतने का सपना आकार लेने लगा। अहमदाबाद में वह सपना साकार हो गया।

सान्विता बनर्जी का योगासन तक पहुंचने का रास्ता कुछ अलग रहा। दुर्गापुर में पली-बढ़ीं सान्विता शुरू में अपने आसपास होने वाली गतिविधियों से प्रभावित हुईं। उनकी मां ने उन्हें नृत्य की कक्षाओं में दाखिला दिलाया, जबकि उनकी बड़ी बहन जिम्नास्टिक का प्रशिक्षण लेती थीं। बहन को कठिन मूवमेंट करते देख उनकी रुचि लचीलापन आधारित खेलों की ओर बढ़ी।

कुछ समय बाद उन्हें महसूस हुआ कि योग में उनकी स्वाभाविक प्रतिभा है। सान्विता ने कहा, “मुझे योग करना अच्छा लगता था क्योंकि मुझे महसूस होता था कि मैं इसमें अच्छी हूं।” आज वह पढ़ाई के साथ-साथ योगासन प्रशिक्षण और बैडमिंटन का भी संतुलन बनाए हुए हैं। अलग-अलग राज्यों और पृष्ठभूमियों से आने के बावजूद दोनों खिलाड़ियों को खेल के प्रति समर्पण ने एक साथ जोड़ दिया।

रिदमिक पेयर स्पर्धा में केवल व्यक्तिगत प्रतिभा पर्याप्त नहीं होती। हर आसन, हर मूवमेंट और हर बदलाव में पूर्ण तालमेल जरूरी होता है। सफलता भरोसे, समन्वय और घंटों की संयुक्त मेहनत पर निर्भर करती है।

उनकी तैयारी का परिणाम अहमदाबाद में देखने को मिला। दुनिया भर के श्रेष्ठ युवा योगासन खिलाड़ियों के बीच ईशिका और सान्विता ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसमें तकनीकी सटीकता और कलात्मक सामंजस्य का अद्भुत मेल दिखाई दिया। इसी प्रदर्शन ने उन्हें स्वर्ण पदक दिलाया और खेल के शुरुआती विश्व चैंपियनों में स्थान दिला दिया।

प्रतियोगिता से बाहर दोनों सामान्य स्कूली छात्राओं की तरह पढ़ाई, गृहकार्य, परिवार और प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाती हैं। लेकिन कम उम्र में उत्कृष्टता के प्रति उनका समर्पण उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।

दोनों खिलाड़ी भविष्य को लेकर बड़े सपने देखती हैं। ईशिका की इच्छा है कि वह भारत के लिए लगातार पदक जीतती रहें और यदि योगासन को बड़े बहु-खेल आयोजनों में शामिल किया जाता है तो वह वहां भी पोडियम पर खड़ी हों। वहीं सान्विता भी लगातार सुधार करते हुए बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व करने का लक्ष्य रखती हैं।

उनकी सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह पूरे टूर्नामेंट में दिखाई देने वाले एक व्यापक रुझान का हिस्सा है। विभिन्न वर्गों में भारतीय युवा खिलाड़ियों ने असाधारण प्रतिभा और गहराई का प्रदर्शन किया, जिसने देश के मजबूत जमीनी योगासन ढांचे को उजागर किया।

कोचों और अधिकारियों का मानना है कि ईशिका और सान्विता जैसे खिलाड़ियों का उभरना वर्षों से स्कूलों और अकादमियों में किए जा रहे प्रयासों का परिणाम है, जहां बच्चों को कम उम्र से ही योगासन से जोड़ा जा रहा है।

जयदीप आर्य का मानना है कि वैश्विक स्तर पर योगासन की पहचान बढ़ने के साथ यह प्रतिभा भारत की सबसे बड़ी ताकत साबित होगी। पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप ने यह भी दिखाया कि यह खेल कितनी तेजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार कर रहा है। अहमदाबाद में 79 देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत की नई पीढ़ी ने यह साबित कर दिया कि योगासन में देश अभी भी मानक स्थापित करने वाला राष्ट्र है।

जैसे-जैसे योगासन को वैश्विक मान्यता मिल रही है और इसे प्रमुख बहु-खेल आयोजनों में शामिल करने की दिशा में प्रयास तेज हो रहे हैं, वैसे-वैसे युवा प्रतिभाओं का विकास और भी महत्वपूर्ण होता जाएगा।

भारतीय योगासन के लिए शायद यही सबसे बड़ी जीत है। पदक जीते और हारे जा सकते हैं, लेकिन निरंतर सफलता के लिए नई प्रतिभाओं की लगातार आवश्यकता होती है। अहमदाबाद में ईशिका, सान्विता और अन्य कई युवा खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत के पास भविष्य के चैंपियनों की कोई कमी नहीं है।

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