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मद्रास मेडिकल कॉलेज में संरक्षित M11 सिर, अल्वंदर मर्डर केस की रहस्यमयी कहानी

चेन्नई फोरेंसिक म्यूजियम का रहस्य: आधा कटा सिर और ऐतिहासिक हत्या की गुत्थी

चेन्नई : तमिलनाडु के चेन्नई स्थित मद्रास मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक संग्रहालय में एक कांच के जार में संरक्षित मानव सिर का आधा हिस्सा आज भी मौजूद है। जार पर “M11” लिखा हुआ है और यह नमूना वर्षों से संग्रहालय में बिना किसी फाइल, दस्तावेज या आधिकारिक विवरण के रखा हुआ है। इस अवशेष के साथ कोई स्पष्ट सरकारी व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है।

यह नमूना एक अंधेरे कमरे में रखी पुरानी लकड़ी की रैक पर संग्रहित है, जहां धूल की मोटी परत जमी हुई है। बताया जाता है कि जार के भीतर पीले फॉर्मेलिन में मानव सिर का आधा हिस्सा संरक्षित है, जिसमें एक आंख, नाक का हिस्सा और होंठों की टूटी हुई आकृति दिखाई देती है, जो एक अधूरे चेहरे जैसा प्रतीत होता है।

फोरेंसिक विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर एक पुरानी कहानी प्रचलित है, जिसे “अल्वंदर मर्डर केस” के नाम से जाना जाता है। कथित तौर पर मृतक का नाम सी. अल्वंदर था, जो पेशे से पेन विक्रेता थे। वर्ष 1952 में उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिसने उस समय मद्रास क्षेत्र में काफी सनसनी फैला दी थी।

उस दौर में आधुनिक डीएनए जांच या जीन संबंधी पहचान तकनीक उपलब्ध नहीं थी, फिर भी यह मामला सिर काटकर पहचान स्थापित करने के शुरुआती और महत्वपूर्ण फोरेंसिक उदाहरणों में गिना जाता है।

घटना की शुरुआत 29 अगस्त 1952 को हुई बताई जाती है। उस समय इंडो-सीलोन एक्सप्रेस ट्रेन मद्रास से कोलंबो के बीच चलती थी, जिसमें कुछ दूरी समुद्री मार्ग से स्टिमर द्वारा तय की जाती थी। इसी ट्रेन के एक हरे रंग के ट्रंक से दुर्गंध आने पर यात्रियों ने रेलवे पुलिस को सूचना दी थी। ट्रेन को मनामदुरई स्टेशन पर रोका गया, जहां जांच के दौरान ट्रंक से एक सिर कटी लाश बरामद हुई।

कुछ दिनों बाद रायापुरम समुद्र तट से मृतक का कटा हुआ सिर भी बरामद किया गया। इसके बाद सिर और धड़ दोनों को फोरेंसिक जांच के लिए मद्रास मेडिकल कॉलेज भेजा गया, जहां फोरेंसिक विभाग के चिकित्सकों ने इसकी जांच की।

डॉ. सी.बी. गोपालकृष्णन ने सिर और शरीर की हड्डियों तथा संरचना का गहन परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि दोनों भाग एक ही व्यक्ति के हैं। जांच में यह भी सामने आया कि मृतक की उम्र लगभग 40 वर्ष थी और उसके कानों में असामान्य रूप से कई छेद थे—दाईं ओर दो और बाईं ओर एक। पैरों पर भी विशेष पहचान चिन्ह पाए गए थे।

बाद में एक महिला ने स्वयं को मृतक की पत्नी बताकर पहचान की पुष्टि की। पुराने सैन्य रिकॉर्ड से लिए गए फिंगरप्रिंट भी इस पहचान से मेल खाते पाए गए, जिससे फोरेंसिक विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मृतक वास्तव में सी. अल्वंदर ही थे।

पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया कि सी. अल्वंदर के कई महिलाओं के साथ संबंध थे, जिनमें एक विवाहित महिला देवकी मेनन का नाम भी शामिल था। जांच के अनुसार, 28 अगस्त 1952 को देवकी मेनन के घर जाते समय उनकी हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि धारदार हथियार से उनका सिर काट दिया गया और सिर को रायापुरम समुद्र तट की रेत में दबा दिया गया, जबकि धड़ को ट्रंक में रखकर ट्रेन के माध्यम से भेजा गया।

यह मामला आज भी फोरेंसिक चिकित्सा के छात्रों और विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय बना हुआ है, जो ऐतिहासिक जांच तकनीकों और पहचान प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।

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